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लिपियों में छुपा बाबा बासुकिनाथ मंदिर का रहस्य

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पंडित अनूप कुमार वाजपेयी

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14 अगस्त 2013, वेबअखबार। संताल परगना पहले पश्चिम बंगाल में था, जिस कारण इस क्षेत्र के अधिकांश शिलालेख हैं बंग्ला भाषा में ही। कुछ शिलालेख संस्कृत, पाली, हिन्दी भाषा में भी हैं। देवनागरी, बंग्ला, पाली और कैथी लिपि में मिलने वाले यहाँ के शिलालेख शोध के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। कई शिलालेखों की विशेषता यह है कि इनमें बंग्ला और कैथी दोनों ही लिपि में पंक्तियाँ लिखी हुई हैं। बाबा बासुकीनाथ मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर भी एक शिलालेख है, जिसमें प्रारम्भ की तीन पंक्तियाँ बंग्ला और इसके बाद की तीन पंक्तियाँ कैथी लिपि में हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार का ऊपरी चैखट काले पत्थर से निर्मित है। इस पर कैथी लिपि में चार पंक्तियाँ लिखी हुई हैं, मगर भाषा है हिन्दी। प्रवेश द्वार के ऊपर और चैखट पर लिखी हुई बातों में छुपा है बाबा बासुकीनाथ मंदिर का इतिहास। इतना ही नहीं, मंदिर के निकट स्थित एक बड़ा पोखर जो शिवगंगा नाम से जाना जाता है, इसमें भी एक शिलालेख है। बाबा बासुकीनाथ को इस क्षेत्र के लोग नागेश ज्योतिर्लिंग भी मानते हैं। वैसे तो विभिन्न क्षेत्रों में और भी कई शिवलिंग हैं, जिन्हें अपने-अपने क्षेत्र के लोग नागेश ज्योतिर्लिंग मानते हैं। भारत में तीन और शिवलिंग हैं, जिन्हें उस क्षेत्र के लोग नागेश ज्योतिर्लिंग कहते हैं। इनमें पहला गुजरात के जामनगर जिला में, दूसरा निजाम हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में और तीसरा अल्मोड़ा से 17 मील दूर उत्तर-पूर्व में यागेश (जागेश्वर) नाम से स्थित है। 1932 ई0 में गीता पे्रस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित कल्याण नामक पत्रिका का शिवांक नामक विशेषांक में अल्मोड़ा के निकट वाले यागेश (जागेश्वर) को ही नागेश ज्योतिर्लिंग बतलाते हुए लिखा गया है कि यह मंदिर आज का नहीं, बहुत पुराना सिद्ध होता है। आगे उल्लेख है कि अनेक प्रकार के प्रमाणों के आधार पर नागेश ज्योतिर्लिंग भी यही सिद्ध होता है। कल्याण के विशेषांक में संताल परगना के बासुकीनाथ नामक स्थल में भी नागेश नाम के ज्योतिर्लिंग होने का कोई उल्लेख नहीं है। बावजूद इसके भक्तों की आस्था ने इस स्थल को अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर ला खड़ा किया है। इसमें कोई दो मत नहीं कि अब से महज सौ वर्ष पूर्व तक मैदानी भाग में दुमका-देवघर मार्ग के किनारे स्थित बासुकीनाथ पहले बहुत ही घने जंगल में था। निःसन्देह यहाँ का शिवलिंग है अति प्राचीन। बहुत बाद में यहाँ मंदिर बना, साथ ही असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाने तथा सब ओर से निराश भक्तों की मनोकामना पूर्ण होने के अनेक दृष्टांतों के कारण बासुकीनाथ की ख्याति दूर तक हो गयी। बासुकीनाथ के विद्वान पं0 कन्हैय्यालाल पाण्डेय ‘ रसेश ’ सहित कई लेखकों ने अपने आलेखों के माध्यम से बासुकीनाथ को ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। रसेश यह भी कहते हैं कि बासुकीनाथ के बदले वासुकिनाथ शब्द का प्रयोग होना चाहिये, जिस कारण 2005 ई0 से बाबा बासुकीनाथ को कुछ लोग बाबा वासुकिनाथ कहने भी लगे हैं। बाबा बासुकीनाथ को एक ओर जहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में दर्शाने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर क्षीर सागर मंथन में प्रयुक्त वासुकि नामक नाग के स्वामी के रूप में आलेखों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। शिवपुराण की कथा के अनुसार दारूक नामक वन में रहता था दारूक नामक राक्षस। यहीं रहती थी दारूका नामक राक्षसी भी। एक बार मनुष्यों से भरी नाव नदी के पार आयी, जिसे दारूक ने पकड़ लिया और उसमें सवार सभी मनुष्यों को कारागार में डाल दिया। इनमें सुप्रिय नाम का एक शिवभक्त भी था, जो आर्तस्वर से भगवान शिव को पुकारने लगा। पुकार सुन शिव ने प्रकट होकर उसे पशुपतास्त्र दिया, जिससे सुप्रिय ने किया राक्षसों का संहार। मान्यता है कि शिव जहाँ प्रकट हुए थे, वहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में उनकी पूजा होने लगी। बाबा बासुकीनाथ के साथ एक और कथा जुड़ी हुई है, जो शिवपुराण में नहीं है। इस कथा के अनुसार दारूक वन में सुप्रिय द्वारा राक्षसों का संहार करने के बाद से शिव लम्बे समय तक ज्योतिर्लिंग के रूप में यहाँ पड़े रहे। कालान्तर में एक बार भयानक अकाल पड़ा, जिस कारण कंद-मूल की तलाश में बसु नामक एक व्यक्ति यहाँ के घने वन में आया। एक कंद खोदकर बाहर निकालने के लिये जब उसने धरती पर अपनी खंती से प्रहार किया तो वह खंती एक शिवलिंग पर लग गयी। इसी समय आकाशवाणी हुई कि मैं नागनाथ हूँ। शिवलिंग पर खंती लगने की घटना से बसु बड़ा ही दुःखी हुआ और उसने इस नागनाथ नामक शिवलिंग की पूजा की। तब से यहाँ नागनाथ यानी नागेश ज्योतिर्लिंग की पूजा बासुकीनाथ नाम से अनवरत होती चली आ रही है। बासुकीनाथ मंदिर के अन्दर चैखट पर खुदी पंक्तियों में वासुकीनाथ शब्द भी है, जबकि मंदिर प्रवेश द्वार के ऊपर लगे शिलालेख की पंक्तियों में बासुकिनाथ अंकित है। प्रवेश द्वार के ऊपर लगे शिलालेख में कुल सात पंक्तियाँ हैं, जिनमें ऊपर की तीन पंक्तियाँ बंग्ला लिपि में तथा नीचे की तीन पंक्तियाँ कैथी लिपि में लिखी हुई हैं। सबसे नीचे की यानी अंतिम पंक्ति लगभग मिट जाने के कारण बिल्कुल ही अपठ्य है। मंदिर के चैखट पर कुल चार बड़ी-बड़ी पंक्तियाँ कैथी लिपि में खुदी हुई हैं, जिनमें बहुत से शब्द घिसकर बिल्कुल ही अपठ्य हो गये हैं। बावजूद इसके चैखट पर लिखी बातों से यह लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि 18 वीं सदी के अन्त में बाबा बासुकीनाथ मंदिर का आस्तित्व था। दोनों ही शिलालेखों पर आगे इस लेखक द्वारा शोध कार्य जारी है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 1770 ई0 में बंगाल में भयानक अकाल पड़ा था, जिसमें मनुष्य की एक बड़ी आबादी मौत के भेंट चढ़ गयी थी। इलाके-का-इलाका उजाड़ हो गया था। अकाल से उत्पन्न स्थिति का वर्णन करते हुए 1779 ई0 में लॉर्ड कार्नवालिस ने यह लिखा था कि बंगाल की एक तिहाई भूमि जंगल हो गयी है, जो भयंकर जानवरों का आवास बन चुकी है। उल्लेखनीय है कि कंद-मूल की तलाश में खंती से खोदने के क्रम में बाबा बासुकीनाथ का शिवलिंग अनायास ही बसु ने देखा था। बासुकीनाथ से अटूट लगाव है भक्तों का। यही कारण है कि गोड्डा जिला के लतौना ग्राम निवासी अशोक कुमार दूबे नामक एक भक्त ने 52 साल तक बाबा बासुकीनाथ का नाम पुस्तिकाओं में 80 लाख बार लिख डाला। अशोक कुमार दूबे के अनुसार लगभग 22 लाख, 37 हजार, 698 बार बाबा बासुकीनाथ का नाम इनके पिता स्व0 द्विजेन्द्र प्रसाद दूबे ने लिखा था। अपने पिता से प्रेरणा लेकर इन्होंने अपनी 72 वर्ष उम्र तक बाबा बासुकीनाथ नाम के पुस्तिकाओं की ढेर लगा दी। इतना ही नहीं, इनके पिता से प्रेरणा लेकर लतौना ग्राम के रोहित मिर्धा नामक एक युवक ने भी बाबा बासुकीनाथ का लगभग 2 लाख नाम पुस्तिकाओं में लिख डाला। इस प्रकार कुल 85 लाख नामों वाली जप पुस्तिकाओं को अशोक कुमार दूबे ने इस लेखक को सुपूर्द कर दिया था। इन सभी पुस्तिकाओं को इस लेखक द्वारा 2008 ई0 में गंगा दशहरा के अवसर पर 13 जून को बाजे-गाजे के साथ बाबा बासुकीनाथ मंदिर में अशोक कुमार दूबे द्वारा अर्पित करा दिया। इस दिन इस लेखक द्वारा बाबा बासुकीनाथ का भव्य श्रंृगार पूजन आयोजित किया गया था। इस लेखक द्वारा लगातार आयोजित भव्य धार्मिक अनुष्ठानों की कड़ी में ही उक्त धार्मिक अनुष्ठान भी शामिल है। अशोक कुमार दूबे ने जप पुस्तिकाओ में बाबा बासुकीनाथ शब्द का प्रयोग इसलिये किया, क्योंकि सर्वत्र इसी नाम से जाना जाता है दुमका जिला का यह शिवलिंग। एक शिलालेख में वासुकीनाथ, तो दूसरे में बासुकिनाथ शब्द अंकित है। इस प्रकार तीनों में से कहें जो भी नाम, भारत के अलावा विदेशों के भी भक्तों की आस्था जुड़ी हुई है इस स्थल से। (साभार : झारखंड की उपराजधानी दुमका से प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक ‘बासुकि मेल’ से।)

(लेखक संताल परगना के जाने-माने पुरातत्वविद् है। )

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संताल परगना का अर्थ प्रबंध : तब और अब

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प्रो0 (डॉ0) योगेन्द्र प्रसाद राय

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14 अगस्त 2013, वेबअखबार। वर्तमान ऐतिहासिक परिदृश्य में संताल परगना की अर्थ संरचना का अनुशीलन इतिहासकारों, राजवैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, मानवशास्त्रियों, विधिशास्त्रियों और जीव-वैज्ञानिकों के लिए एक मुखरित एवं पेचिंदा प्रश्न बना हुआ है। इस प्रश्न का वैज्ञानिक हल निकालने में प्रशासन लगा हुआ है। प्रशासन सतत् प्रयत्नशील रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में संताल परगना के अर्थ प्रबंध का यदि हम विश्लेषण करें तो हमारे सम्मुख प्रश्न उठने लगते है कि क्या संताल परगना का अर्थ प्रबंध आज इतिहास के पन्नों से विस्मृत हो जा रहा है ? इसका दायरा सिमटता जा रहा है ? क्या ‘ठाकुर’/बोंगा की देन भू-उत्पाद और जंगली@प्राकृतिक संसाधनों और जनजातियों/आदिवासियों के बीच किसी बिचैलिए की आवश्यकता है ? क्या आदिवासियों और अन्य छोटे एवं मंझौले कृषकों की भूमि से अतिरिक्त उत्पादन (सरप्लस प्रोड्क्शन) पर स्वामित्तव का प्रश्न और हाट-बाजार में उनके द्वारा उत्पादित/संग्रहित वस्तुओं का अमूल्यन जारी रहेगा ? क्या प्राचीन संताल परगना की शिक्षा व्यवस्था और कला की गतिविधि पुनः कायम नहीं हो सकेगी ? चीनी यात्री हेनसांग (638 ई0) के शासक राजा रामपाल के दरबारी संस्कृत कवि संध्याकर नन्दीन (1158 ई0), बादशाह अकबरकालीन मुगल इतिहासकार अबुल फजल (16 वीं सदी के अंतिम दशक और 17 वीं सदी के प्रथम दशक) और बुकानन (1810-11), मार्टिन(1838), विलियम विल्सन हन्टर (1877), ‘शॆरविल (1853) आदि अंग्रेज विद्वान लेखकों ने संताल परगना के अर्थ प्रबंध और सामाजिक संरचना पर अपनी-अपनी विहंगम दृष्टि डाली है। विदेशी पर्यटक एवं बौद्ध भिक्षु हेनसांग ने हमॆं बताया कि संताल परगना के उत्तरी क्षेत्र/गांगेय प्रदेश की भूमी बराबर जोती जाती है और बहुत सारी फसले उगायी जाती है। लोग व्यवहार कुशल है, शिक्षा का सम्मान करने वाले और कलाप्रिय है। इसने सूचना दी कि केवल राजमहल के क्षेत्र में छहः एवं सात शिक्षण संस्थाएं है, जहां 300 शिक्षक(ब्रदरेन) काम में जुटे हुए है। संध्याकर नन्दीन ने संताल परगना में धान, विभिन्न प्रकार के फलों और अनाज, मसाले, मधु, मोम, ईख, बांस, ईमारती लकड़ियों, वनस्पति औषधियों आदि का उल्लेख किया है। अबुल फजल आईन-ए-अकबरी भाग-दो में उपर्युक्त तथ्यों पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी एवं ट्रांस हिमालयन व्यापार की सूचना दी, तो अंग्रेज विद्वानों में से कुछ ने संताल परगना की आर्थिक अभिवृद्धि को देखकर इसे दुनिया की रोशनी कह डाला। 12 वीं सदी एवं 17 वीं सदी को संताल परगना के आर्थिक अभिवृद्धि का काल माना जाता है। 17 वीं सदी में संताल परगना के उत्पादित मालों को जहाज और नावों पर लादकर फारस, ओमन, चीन, इथोपिया, वेनिस के बाजारों तक पहुंचाया जाता था। बंगाल की खाड़ी के माध्यम से अरब सागर होते हुए मध्य एशिया तथा ओमेज अंदन एवं लाल सागर के माध्यम से यूरोपीय बाजारों में उत्पादित वस्तुएं पहुंचायी जाती थी। अंग्रेज विद्वानों ने यहां के उत्पादन पर खुल कर बहस की है, जिसमें ‘एकनॉमिक ड्रेन’ नामक सिद्धांत पर हमें काम करने के लिए प्रेरित कर दिया, जिसका पहला प्रयोग दादा भाई नौरोजी ने 1905 में ‘अन पोवर्टी ऑफ इंडिया’ में किया। संताल परगना की सामाजिक संरचना समाज के विभिन्न घटकों से मिलकर बनी है। देशजः, संस्कृत, बंगला, कायथी, फारसी, उर्दू और विदेशज खासकर चीनी और ब्रिटानी साहित्यिक स्रोतों में ऐसे समाज को ‘हेट्रोजेनस’ कहा गया है। ऐसे समाज का अर्थ प्रबंध समाज द्वारा सरप्लस प्रोड्क्शन (अतिरिक्त उत्पादन) पर निर्भर था। खेती और जंगलों का मुख्य उत्पाद, जो सरप्लस में जाता था वह महाजनों अथवा व्यापारियों एवं बिचैलियों को जाता था। इसे मध्यकालीन भाषा में ‘अमीर’ और जमींदार अथवा जागीदार कहते है। इसमें ‘रेयाया’ को बड़ा कष्ट होता था। बादशाह अकबर पहले थे, जिनका स्थान इस तरफ गया और उन्होंने टोडमरमल और साम्राज्य के भू-प्रबंध से जुड़े अन्य सरकारी ‘एजेंटों’ को साफ निर्देश दिया कि साम्राज्य की प्रजा कैसे सुख-समृद्धि से जीवन निर्वाह करेगी। इस तथ्य को सम्राट अशोक ने सर्वप्रथम धर्म के अनुरूप व्याख्या की थी कि धम्म/धर्म क्या है ? भूमि और जंगलों से उत्पादन सरीखे तथ्यों पर यदि हम बहस जारी रखे तो वर्तमान में संपूर्ण संताल परगना दामिन-ए-कोह वाले क्षेत्र के साथ उपर्युक्त स्थिति ही बनी हुई है। खरीददारों से सीधा संपर्क नहीं होने के कारण उत्पादक बाजार में ठगा रह जाता है और उसके द्वारा उत्पादित वस्तुओं का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। यहां अर्थशास्त्रियों का ‘रिजिड डिसिप्लीन’ गांवों से कम दूरी पर स्थित बाजार सम्वन्यी नियम लागू हो जाता है। कृषि सम्बन्धी व्यवस्था ग्रामीण सामुदायिक व्यवस्था पर भी निर्भर करती है, जहां प्रधानों/सरदारों मांझियों/परगनेतों की भूमिका अति महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसी स्थिति में आदिवासी समाज में ‘मत्स्य न्याय’ मुखरित हो जाती है। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। ऐसी परिस्थिति को संतुलित करने के लिए सम्राट अशोक ने धर्म महामायो को नियुक्त किया था और बादशाह ‘ाहंशाह अकबर ने चैधरियों, मुकदमों, कानूगोवों पहवारियों को स्पष्ट निर्देश दिये थे। मध्यकालीन संताल परगना का व्यापार नील, ताम्बा, लाह, मधु, मोम, सिटक, वनस्पति, सरसों, औषधि, कीमती लकड़ी आदि पर चलता था। वर्तमान में यह स्थान सिटक और सेमल की रूई पर अटक गया है। दुमका, गोड्डा, साहिबगंज से ककून को कृषकों द्वारा एकत्र कर व्यापारी इसे भागलपुर, मिर्जापुर, बनारस, गया, पटना और वर्दवान तक पहुंचाते है। बिचैलियों को इससे 50 प्रतिशत से अधिक मुनाफा होता है। बिचैलिए इससे मालामाल हो गए और बेचारे कृषक सहज में डूब गए। इसने एक सामाजिक संघर्ष को जन्म दिया। नक्सलवाद के पनपने का यह एक बहुत बड़ा कारण साबित हुआ। कृषक वर्ग की ऋण ग्रस्तता प्रत्यक्ष थी और व्यापारियों की प्रवृत्ति स्पष्ट थी कि भूमि पर कब्जा नहीं : वरन् किसानों की श्रमशक्ति का शोषण करना। रस्सी बनाने, ताड़ के पत्ते के छाता बनाने, चटाई बनाने, लट्टू बनाने, टीन के दीपक बनाने की कला का खूब ह्ास हुआ। भागलपुर की मंजूषा कला और मधुबनी पेंटिंग जैसी कलात्मक प्रवृत्ति संग्रह संपदा की लूट हुई और भारी मात्रा में धन की निकासी हुई। परिणाम स्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में एक सामाजिक क्रांति हुई। खड़ी बनाने वाले, चारकोल बनाने वाले, मोम बनाने वाले, लाह बनाने वाले, पत्थर की सुन्दर मूर्तियां बनाने वाले, कारीगरों और संताल कृषकों ने 1855-56 ‘हूल’ के रूप में विद्रोह किया। दक्षिण भारत में भी पुणा और अहमदाबाद में 1875 में महाजनी दंगे हुए। स्वाधीनता आंदोलन का लक्ष्य गरीबी का उन्मूलन करना, जनता को शिक्षित बनाना और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास करना है। यद्यपि हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि हमारे पैर संताल परगना की उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहे है। शिक्षण व्यवस्था के ठहराव को एक नई दिशा और दशा मिली है।

((लेखक विश्वविद्यालय प्रोफेसर है और वर्तमान में सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका में स्नातकोत्तर इतिहास विभाग एवं समाज विज्ञान संकाय के अध्यक्ष है। ) साभार : झारखंड की उपराजधानी दुमका से प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक ‘बासुकि मेल’ से।

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हूल दिवस : जब शोषण के विरूद्ध उठी थी आवाज
30 जून हूल दिवस पर विशेष

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डॉ0 शेषनाथ राय

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30 जून 2013, वेबअखबार। भारत के स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई 1855 में संताल हूल के रूप में शुरू हुई। यह लड़ाई संतालों द्वारा गैर आदिवासी महाजनों, जमीनदारों और अंग्रेजो के शोषण के विरूद्ध थी। इस लड़ाई के नायक सिदो-कान्हू थे। सिदो और कान्हू के पिता का नाम चुनु मांझी (मुर्मू) और माता का नाम सालोना मांझी था। सिदो और कान्हु चार भाई थे, उनका नाम सिदो, कान्हु, चांद और भैरव था। वे बरहेट के निकट भोगनाडीह के रहने वाले थे जो अब साहेबगंज जिला में है। ये चारों भाई अति साधारण भूमिहीन वर्ग के व्यक्ति थे, परन्तु उन लोगों का कहना थ कि इन्हें ईश्वरीय दूत के दर्शन हुये हैं और उनसे दिव्य संदेश की प्राप्ति हुई है। संताल जनजाति शांत और अमन पंसद जनजाति थी। वे 1854 के मध्य तक दिकुओं के शोषण के हिंसक विरोध के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। शुरू में संतालों के नेता ईस्ट इंडिया कम्पनी से शांतिपूर्ण बातचीत के जरिये संताल राज्य के लिये स्वशासन का विचार रखते थे। यहाँ तक कि टकराव टालने के मकसद से कई गांवों के संतालों ने बिना किसी प्रतिरोध के अपना घर छोड़ दिया था। जंगल तराई कहे जाने वाले इस क्षेत्र में पहाड़िया जनजाति की बहुलता थी और पहाड़िया ही इस क्षेत्र के मूल निवासी थे। 1790-1810 के बीच इस क्षेत्र में संतालों का प्रवेश हुआ। अपने परिश्रम और तत्काल ब्रिटिश सरकार (1828-1935) से प्रोत्साहन पाकर राजमहल की पहाड़ियों के आधार क्षेत्रों से लेकर समतल इलाकों तक फैले जंगलों को साफ-कर स्थानीय मूल निवासी पहाड़िया जनजाति के लोगों के विरोध के बावजूद संताल इस क्षेत्र में बस गये। 1833 ई0 में गोड्डा, दुमका, राजमहल और पाकुड़ के मध्य स्थित 1338 वर्गमील का वन पर्वतीय क्षेत्र दामिन-इ-कोह के नाम से अलग कर इसे पहाड़ियों के लिये आरक्षित कर दिया गया। 1837 ई0 में जेम्स पोन्टेट को दामिन-इ-कोह का अधीक्षक बहाल किया गया और उन्हें वित्तीय तथा सामान्य कार्यो का उत्तरदायित्व सौंपा गया। जेम्स पोन्टेट संतालों को दामिन-इ-कोह में बसने के लिये प्रोत्साहित किया। फलस्वरूप 1851 ई0 तक दामिन-इ-कोह में संतालों की संख्या 82795 और उनके गांवों की संख्या 1473 हो गयी। अंग्रेजों ने इस क्षेत्र विशेष से नियमित राजस्व प्राप्ति की एक व्यवस्था कर ली। इस कार्य के लिए एक विशेष अधिकारी पोंटेट की नियुक्ति की गयी। आदिवासी समुदाय जिसने अपनी मेहनत से दामिन-इ-कोह के जंगलों को साफ कर खेती लायक जमीन बनायी थी, का भीषण शोषण हो रहा था। सरकार को नियमित राजस्व चुकाने के लिये उन्हें महाजनों से कर्ज लेना पड़ता था। महाजन उदारता से कर्ज देते और सूद के रूप में उनकी फसल का एक बड़ा हिस्सा उठा ले जाते। बंगाली मूल के हिन्दू जमीनदार संताल गांवों में गैर आदिवासी जमीनदारों को बसाने में लगे थे। महेशपुर और पाकुड़ के राजा संतालों के गांवों को गैर आदिवासियों को लीज पर दे रहे थे। सरकारी राजस्व में लगातार वृद्धि हो रही थी। लेकिन जमीनदार, सूदखोर, महाजनों तथा थाना के अमलो द्वारा आदिवासियों का भीषण शोषण हो रहा था। 1855 ई0 की शुरूआत में वीरभूम, बांकुड़ा, छोटानागपुर और हजारीबाग से लगभग 6-7 हजार संताल आये, जो संतालों को दिये गये दंड का प्रतिशोध लेना चाहते थे। उनकी शिकायत थी कि उनके साथी संतालों को तो दंडित किया गया पर महाजनों पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी । इन संतालों का नेतृत्व दो सहोदर भाई सिदो और कान्हु कर रहे थे। उनके दो छोटे भाई चांद और भैरव भी उनके साथ थे। 30 जून 1855 को ही चांदनी रात में करीब दस हजार संताल भोगनाडीह गांव में एकत्रित हुए। उन्होनें यह घोषणा किया कि वे जमीन का टैक्स नहीं देंगे। ऋण चुकता नही करेंगे। जितनी जमीन पर चाहे खेती करने के लिए वे स्वतंत्र है। वे इस जमीन के असली मालिक और शासक है। सिदो और कान्हू को सर्वसम्मति से ‘सूबा ठाकुर’ घोषित किया गया। उन्होनें ठाकुर के आदेश की घोषणा करते हुये कहा कि संतालों को महाजनों, जमीनदारों पुलिस और अंग्रेज अधिकारियों के चंगुल से निकल जाना चाहिये। यह भी निर्णय लिया गया कि अपने देवताओं के निर्देशानुसार अब वे अपने सूबों को भैसों के हल के पीछे एक आना और गायों के हल के पीछे आधा आना की दर से मालगुजारी दिया करेंगे। सूद की दर प्रति रूपये सालाना मात्र एक पैसा निर्धारित की गयी। यह आदेश भी दिया गया कि सभी दरोगाओं और महाजनों को खत्म कर दिया जाये तथा सभी व्यापारियों, जमीनदारों और धनी बंगालियों को अपने जंगल तराई से निकाल दिया जाये। उनकी मांगे उनकी आर्थिक दशा में सुधार के लिय ही थी। संताल दामिन क्षेत्र को अपने अधीन कर लेना चाहते थे तथा सिदो और कान्हू ने अपने को वहां का सूबा (राज्यपाल) घोषित कर दिया था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिय संतालों ने खून खराबा का भी सहारा लिया। गोड्डा अनुमंडल के करहरिया थाना के दरोगा प्रताप की हत्या कर दी गयी, जो संतालों को गिरफ्तार करने गये थे। भागलपुर के दंडाधिकारी एच0ई0 रिचर्डसन तथा पोन्टेट जो उस वक्त राजमहल में थे, भयाकुल होकर शाह शुजा के राजमहल तथा तत्कालीन रेलवे इंजीनियर के आवास में शरण ली। उनका घर घेर लिया गया और तब तक घिरा रहा जब तक एक सैन्य दल ने आकर मुक्त नहीं कराया। दिग्धी के दरोगा महेश लाल दत्त अपने दल के साथ 7 जुलाई, 1855 को पंचकठिया पहुंचे। दारोगा ने पुलिसिया रोब दिखाते हुए सिदो और कान्हू को गिरफ्तार करने की कोशिश की, जिससे संताल काफी क्रोधित हो गये। जैसे ही दारोगा ने सिदो पर हाथ डाला वैसे ही उत्तेजित और क्रोधित संतालों की भीड़ उसपर टूट पड़ी और दारोगा, उसके दल के सिपाहियों और कुछ अन्य लोगों की हत्या कर दी, जिनकी संख्या 19 थी। इनमें एक महाजन एक बरकन्दाज और कुछ चैकीदार शामिल थे। सभी विद्रोही हूल-हूल (विद्रोह-विद्रोह) चिल्ला उठे और बड़े ही उत्तेजित वातावरण में नारा लगाया - जमीनदार, महाजन, पुलिस और आमलाको गोजोकभा, अर्थात जमीनदार, महाजन, पुलिस और सरकार के कर्मचारियों का नाश हो। भागलपुर के आयुक्त सी0एफ0 ब्राडन को 8 जुलाई को क्रांति फैले जाने की खबर मिली। मेजर एफ0डब्ल्यू0ब्यूरो की अध्यक्षता में सैन्य दल जो मुख्यतः पहाड़ी घुड़सवारों का था, 10 जुलाई को रवाना हुआ और पीरपैंती के समीप लड़ाई में संताली लोग अपने तीर-धनुष और फरसों के बल पर उस सैन्य दल को पराजित करने में सफल हुए। विभिन्न स्थानों पर विद्रोह फैल गया। महाजन और अत्याचारी जमीनदार संतालों के क्रोध का शिकार हुए। कई स्थानों पर भिड़न्त में संताल मारे गये, गिरफ्तार हुए और दंण्डित किये गये। 15 जुलाई को करीब 300 विद्रोही 7वीं राष्ट्रीय पैदल सेना के धिर गये। इस संघर्ष में सिदो, कान्हू और भैरव को गोली लगी और अन्य 200 संताल घायल तथा मृत्यु के शिकार हुए। 7वीं राष्ट्रीय पैदल सेना की दूसरी टुकड़ी ने पाकुड़ से पश्चिम तराई नदी के किनारे बहुत से संतालों को परास्त किया। कुछ ही दिनों के बाद सिदो अपने ही अनुयायियों द्वारा भागलपुर के फौजी दस्ते के हाथों सौंप दिया गया। विश्वासधातियों को उनके साथी जनजातियों द्वारा शीघ्र की कत्ल कर दिया गया, जबकि उनके पूज्य नेता सिदो को दामिन-इ-कोह के अधीक्षक पोन्टेट के द्वारा भोगनाडीह के अनेक संतालों और अन्य समुदाय की उपस्थिति में एक महुआ पेड़ से लटकाकर सरेआम फांसी दे दी गयी। जामताड़ा से हजारीबाग जाने के रास्ते में कान्हू को 30 नवम्बर 1855 को पकड़ लिया गया। कान्हू के विरूद्ध देशद्रोह और हत्या का अभियोग चलाकर उसे मृत्युदंड दे दिया गया। ऐसा माना जाता है कि भागलपुर के निकट जबर्दस्त लड़ाई में चांद और भैरव पहले ही शहीद हो चुके थे। इस महान विद्रोह के बाद संताल परगना में प्रशासनिक सुधारों का दौर शुरू हुआ। कई तरह के कानून अस्तित्व में आये। संताल परगना रेगुलेशन- 3,1908 बना। इसके अन्तर्गत उस क्षेत्र में संतालों की जमीन के हस्तान्तरण पर पूर्ण रोक का प्रावधान किया गया। इस कानून के बनने और लागू होने की पृष्ठभूमि संताल हूल ही था। आजादी के बाद इस कानून के प्रावधानों को संताल परगना टेनेन्सी एक्ट, 1949 में कायम रखा गया। विद्रोह को कुचल दिये जाने के कारणों की जांच ऐथले एडन ने की। परिणाम यह हुआ कि 1855 के 37वें अधिनियम के अनुसार संताल क्षेत्रों को एक अलग ‘नॉन रेगुलेशन’ जिला घोषित कर दिया गया, जिसका नाम संताल परगना पड़ा। जिला का शासनभार भागलपुर के कमिश्नर की देख-रेख में एक डिप्टी कमिश्नर के हाथ में सौंपा गया। शासन की विशेष प्रणाली में संताल मांझी परगनैत प्रथा का प्रयोग भी सम्मिलित किया गया।
डॉ0 शेषनाथ राय

(लेखक राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर और वर्तमान में सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अधिष्ठाता है।)

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होलिका दहन की रात बासुकिनाथ में होता तांत्रिकों का जमावड़ा

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अजय भारती, बासुकिनाथ

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26 मार्च 2013, वेबअखबार। तंत्र साधना के लिए सनातन धर्म ग्रन्थों में शिवरात्रि, दीपावली की रात, कृष्णाष्टमी, शारदीय दुर्गाष्टमी की रात्रि बहुत ही महत्वपूर्ण मानी गयी है। शास्त्रों में यह रात्रियां काली, भैरव, लक्ष्मी के अलावा वायव्य साधानाओं के लिए महत्वपूर्ण मानी गयी हैं, शाबर मंत्र साधना और सिद्धि के लिए सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण के अलावा होलिका दहन की बेला को विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। शाबर मंत्र साधकों का मानना है कि इसकी साधना और सिद्धि के लिए जिस तरह ग्रहण काल में रवि, मंगल, पुष्प योग को महत्वपूर्ण माना गया है, उसी प्रकार होलिका दहन की रात्रि भी इस साधना के लिए विशेष फलदायी है। मान्यता है कि इस रात्रि में सिद्ध किये गये शाबर मंत्र इतने प्रभावशाली होते है कि साधक को त्वरित फल प्रदान करते है। इसलिए इस रात्रि को शाबर साधक अमोग सिद्धदात्री रात्रि के रूप में तंत्र शास्त्रों में स्थान प्राप्त है। शास्त्रों के अनुसार शाबर मंत्रों के प्रणेता स्वयं भगवान शिव हैं। शिव ने ही माता पार्वती के आग्रह पर जन कल्याण हेतु इन मंत्रों की रचना अति सरल शब्दों में की है। बाद में भारतीय संतों की एक शाखा नाथ संप्रदाय के मत्स्येन्द्र नाथ और गुरू गोरखनाथ के अलावा अन्य मतावलंबियों ने भी शाबर मंत्रों को सिद्ध करने की परंपरा विकसित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनके अनुयाईयों ने शाबर मंत्रों को मरने नहीं दिया। अनमिल अक्षर वाला होने के कारण शाबर मंत्र पढ़ने व सुनने में अटपटा लगता है, लेकिन यह है कल्याणकारी भी। शाबर मंत्र शास्त्र में इन मंत्रों के बारे में तो यहां तक बताया गया है कि कोई ऐसा कार्य ही नहीं है, जो शाबर मंत्र द्वारा सफल नहीं हो सकता। झारखंड के बाबा बासुकिनाथ दरबार में भी होली दहन की रात्रि में तांत्रिक शाबर मंत्रों की साधना करते है, जिनके द्वारा बताये गये कुछ मंत्रों को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।
01: मंत्र : ओम नमः बज्र का कोठा जिसमें पिण्ड हमारा पेठा ईश्वर कुंजी ब्रहमा का ताला मेरे आठों याम का यती हनुमान रखवाला।
: एक साधक ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि होलिका दहन की रात्रि में उक्त रक्षा मंत्र का 108 बार जप कर सिद्ध कर लेने पर ही सिद्ध हो जाता है और संकट की घड़ी में इसका मात्र सात बार पढ़कर ताली बजाने से निश्चित रूप से संकट टल जाता है।
02- मंत्र : ओम काली काली महाकाली, इन्द्र की बेटी ब्रहमा की साली, उड़ बैठी पीपल की डाली, दोनों हाथ बजावे ताली, जहां जाये बज्र की ताली, वहां न आवे दुश्मन की हाली, दुहाई कामरू कमख्या नैना योगिन की, दुहाई ईश्वर महादेव गौरा पार्वती की, दुहाई वीर मसान की।
: उक्त मंत्र को सिद्ध करने के बाद पूर्व मंत्र के तरह ही ताली बजाने से रक्षा होती है।
03: ओम नमो आदेश गुरू के ईश्वर बाचा अजरी, बजरी बाड़ा बज्जरी मैं बज्जरी बांधो दसो दुआर, जे करें तो पलट वीर हनुमान उसी को मारे-पहली चौकी गणपत्त, दुजी चौकी हनुमत, तीजी चौकी भैरो, चौथी चौकी में रक्षा करण को आवे श्री नरसिंह देवजी, शब्द सांचा पिण्ड कांचा फुरो मंत्र ईश्वरीय बाचा।
: इस मंत्र को सिद्ध कर पीला सरसों या काला उड़द 21 बार अभिमंत्रित कर जहां भी बिखेर दिया जाय, वहां निश्चित रूप से भूत-प्रेत आदि की बाधा नहीं रहेगी। कही-कही इस मंत्र से लोहे की कील अभिमंत्रित कर चैखट में गाड़ने का विधान है।
: शाबर मंत्र के बारे में गोस्वामी तुलसी दास ने भी रामचरित मानस में प्रकाश डाला है। बासुकिनाथ आने वाले तांत्रिकों का दावा है कि आज भी ये शाबर मंत्रों से कल्याणकारी कार्य करते है। भले ही शाबर मंत्र के बारे में आम लोगों को जानकारी नहीं है, मगर बासुकिनाथ पहुंचकर मंदिर परिसर और यहां के श्मशान में साधना करने वाले तांत्रिक अपने गुरूकुल की परंपरा के अनुसार इन मंत्रों के वाहक है।

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पेड़ से झरता अबीर व पलाश का रंग आज भी होली में देता आनन्द

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24 मार्च 2013, वेबअखबार। बसंत आते ही रंग-बिरंगे पुष्पों से अपना श्रृंगार कर झूम उठती है प्रकृति, जिससे नाच उठता है लोगों का मन। कदम्ब फूलों से झरने वाले पराग-कण भी ”थैय्या थैय्या ता थैय्या“ लय के साथ गिरते हुए जान पड़ते हैं और उसी लय के साथ कदम्ब तले बाँसुरी बजाता परिलक्षित होता है कान्हा। यही कारण है कि ढोलक और झालों को बजाते हुए बसंत पंचमी से लेकर फागुन भर उक्त परिकल्पना भरा परम्परागत होली गीत गाते हैं ग्रामीण :
"झरने लगे गुलाल कदम्ब से थैय्या थैय्या ता थैय्या,
ता थैय्या हो लाल, कान्हा बजावे बाँसुरिया।''
झारखण्ड के संताल परगना प्रमंडल सहित बिहार राज्य के एक बड़े भाग के होली गीत में कदम्ब से गुलाल झरने का परिदृश्य है, मगर दुमका जिला में लकड़ापहाड़ी ग्राम के उत्क्रमित मध्य विद्यालय परिसर में वास्तव में खड़े हैं तकरीबन 20-20 फीट उंचे अबीर के दो पेड़, जिनमें लगे मंजरों से झरता है लाल अबीर। मंजर जब फल बन जाते हैं तब भी उन पर अबीर की परत जमी रहती हैं। बच्चे उत्साह में हैं इस प्राकृतिक अबीर को एक दूसरे के गालों पर मलने के लिये। विद्यालय में पढ़ने वाली अष्टम् वर्ग की छात्रा आशा कुमारी और सप्तम् वर्ग का छात्र जयराम मंडल का कहना है कि पेड़ का अबीर बाजार में बिकने वाले अबीर की अपेक्षा ज्यादा गुणकारी है। न ही इसमें अबरक या इत्र मिलाने की आवश्यकता है। एक अपनी चमक और दिव्य खुशबू है पेड़ से झरने वाले इस अबीर में। यहाँ के ग्रामीण पलाश के फूलों का भी रंग बनाकर होली खेलते हैं, जो त्वचा के लिये हानिकारक नहीं है। विद्यालय के प्रधानाध्यापक रामप्रवेश सिंह का कहना है कि संताल परगना में अबीर के पेड़ बहुत कम बचे हैं, जिन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है। दुमका के ननकु कुरूवा ग्राम निवासी प्रदीप कुमार मंडल कहते हैं कि ग्रामीणों के बीच मान्यता है कि पलाश के रंग में औषधीय गुण है, जो चेचक के जीवाणुओं को भगाता है। बावजूद इसके बाजारवाद के कारण प्राकृतिक रंग-अबीर का प्रयोग करने की परम्परा अब पीछे छूटने लगी है। त्वचा के लिये हानिकारक रंग-अबीर एक-दूसरे पर उड़ेलकर आनन्दित होना लोग अपना धर्म समझने लगे हैं।
(होली पर पंडित अनूप कुमार वाजपेयी का विशेष खोजी आलेख)

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