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अनोखे बाल वाले शख़्सीयत दुर्गा सोरेन

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राजमहल के मंगलहाट से पंडित अनूप कुमार वाजपेयी

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04 दिसम्बर 2012 : जरा इस जनाब को देखिये। इनके माथे को देखकर टोपी का भ्रम हो जायेगा। दरअसल इनके माथे के बाल टोपी की सकल में है,जिस कारण लोग भ्रम में पड़ जाते हैं। यह इनके घुँघराले बालों का कमाल है। जनाब का नाम है दुर्गा सोरेन। उम्र करीब 27-28 वर्ष। रहनेवाले हैं झारखण्ड अंतर्गत राजमहल स्थित मंगलहाट के निकट जदुआ टोली के। बालों का ऐसा जादू बिखेर रखा है कि गाँव-जवार में चर्चित हो गये हैं। कहीं भी सैलून नजर आने पर ये झट से पहुँच जाते हैं और लगते हैं बालों में कंघी मारने। दुर्गा ने बालों को इतनी खूबसूरती से इसलिये नहीं सँवारा है कि इनका नाम गिनीज बुक या लिम्का बुक में दर्ज हो। इन्होंने तो ऐसे किसी बुक का नाम तक नहीं सुना है। दुर्गा का कहना है कि माथे के बाल बचपन से ही घुँघराले हैं। बस थोड़ा सा सजाते-सँवारते रहते हैं। परिवार की माली हालत खराब है। इसलिये शादी-विवाह में पहुँचकर कठघोड़वा नाच दिखलाते हैं। आकर्षक कपड़े से सजाये काठ के घोड़े में घुसकर नाचते हैं, जिससे लोग आनंदित होते हैं। दुर्गा ने आगे बताया कि कठघोड़वा नाच दिखलाकर रोटी चलाने का तरीका खुद ही ढूँढा। चार भाइयों में सबसे बड़े हैं। तीसरा भाई जसाय सोरेन भी कठघोड़वा नाच में साथ देते हैं। कुल पाँच व्यक्तियों की टीम है। मगर दुःख इस बात का है कि सालोभर कठघोड़वा नाच दिखलाने का अवसर नहीं प्राप्त होता है। रंगीन महफिल वाली दुनियाँ में आज कठघोड़वा नाच को कौन पूछता है? बावजूद इसके दुर्गा सोरेन इस प्राचीन कला को आज भी जीवित रखे हुए हैं। जहाँ तक घुँघराले टोपीदार बालों के कारण लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनने का सवाल है, तो भगवान श्रीकृष्ण भी कुंचित केश वाला होने के कारण मोहित करनेवाले देवताओं में अग्रणी माने जाते हैं।
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कमाल है कश्ती फूलजोनी की

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राजमहल से पंडित अनूप कुमार वाजपेयी ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
06 दिसम्बर 2012 : मेरा नाम फूलजोनी। रहती हूँ गंगापार और छोटी सी कश्ती ही लगायेगी जिन्दगी की नैया पार। आपनीं बोस्ते पारबेन नाँय, बोसबेन तो केटे जाबे (आप नहीं बैठ सकीयेगा, बैठियेगा तो आपको कट जायेगा)। केनों (क्यों)? इसलिए कि यह टीन की बनी है। चारो ओर खड़ा किनारा धारदार है। बैठते ही कट जायेगा और खून निकलने लगेगा। मात्र एक ही व्यक्ति के बैठने की जगह है। नौका ऐसी है कि आप के बैठते ही पानी में डूबने लगेगी। इसमें भी प्रायक्टिस की जरूरत है। मुझे तो अभ्यास हो गया है। गजब साहस है आपको? गंगा की तेज धारा में आप काफी दूर दिखलाई पड़ रही थीं, मगर कैमरा ऑन कर क्लोजप करते-करते तुरत हांफते हुए गंगा किनारे आ गयीं। इतना तेज चप्पू चलाती हैं कि आश्चर्य होता है ! थक गयी होंगी आप? एकदम सामान्य होकर जवाब देती है नहीं, कहाँ थकी हूँ। मात्र 25 मिनट ही तो लगता है तीन किलोमीटर दूरी तय करने में। यह एक दिन का काम थोड़े ही है। आना-जाना तो लगा ही रहता है। नाव किनारे लगाते ही सब्जी का आगे रखा डलिया उतार कर रखती है। सवालात पूछने पर उपरोक्त जवाब बांग्ला भाषा में देती रहती है और पानी में खड़ी कश्ती को एक हाथ से खींचकर गंगा की रेत पर ला रखती है। सब्जी का दाम पूछने पर बताती है चना साग 14 रू0, मूली 7 और मटर साग 10 रू0 किलो। दाम कम करने की बात कहने पर जवाब छूटता ताजी सब्जी है। ले लीजिये। अभी बाजार जाकर बेचूंगी तो ज्यादा दाम मिलेगा। उपराजधानी दुमका में तो चना साग आसानी से मिलता भी नहीं है। यदा-कदा मिलता भी है तो 40 रू0 किलो, यह सोच कर कहता ठीक है इसे दे दीजिये। एक कीलो के बटखरा से साग तौलते जाती है और पूछे जानेवाले सवालों का जवाब भी देते रहती है। अच्छा कसरत हो जाता है आपका? चप्पू (पतवार) चलाने से हृदय रोग नहीं होगा। बहुत बड़ा योगा है। जवाब देती है हृदय रोग क्यों होगा ? कहाँ से आयी हैं बेचने? उस पार कार्तिक टोला से। गंगापार सब्जी की खेती के बाबत पूछने पर बतलाती है कि वहाँ कार्तिक टोला के अलावा नारायणपुर और भुतनी में काफी उपज होती है। कार्तिक टोला में करीब 150, भुतनी में भी 150 और नारायणपुर में करीब 500 परिवार रहते हैं। नौका बेचीयेगा? जवाब में कहती है न, इसपर सवारी नहीं कर पाईयेगा। यह ख़ास तरह की नौका है। वैसे लागत दाम एक हजार रुपये में दे दूँगी। कहाँ बनवाती हैं नौका? कहीं नहीं। खुद बनायी हूँ। बातचीत में यह पूछे जाने पर कि आप बंग्लादेशी हैं या प0 बंगाल का मूल निवासी। जवाब टालते हुए कहती है आमरा कृष्णेर भोक्तॅ (हमलोग कृष्ण के भक्त हैं)। बराबर यहाँ आकर कन्हैय्या स्थान जाती हूँ। इस्कॉन से जुड़ी हूँ। देखते हैं कृष्ण का भक्त होने के नाते ही राधा की तरह ही नाक तक चंदन लगायी हूँ । इतनी बात होते-होते तीन कीलो साग तौल देती है तथा टमाटर इत्यादि लेने कहती है। ना का जवाब मिलने पर वह 42 रू0 लेती है और डलिया काँख में दबा एक हाथ से नाव को उठाकर माथे पर रख निकट स्थित राजमहल बाजार चल देती है सब्जी बेचने। चारो तरफ कुहासा में लिपटी ठंढ के बीच गंगा किनारे मन में सवाल का गुबार उठता है कि आपस में शत्रुता रखनेवाले राजाओं के महल से राजकुमारी और राजकुमार अपनी-अपनी नौका लेकर चुपचाप कैसे एक दूसरे से मिलने चल देते होंगे और प्यार की गंगा में गोता लगाकार राजमहल वापस? आज के उपन्यासों में ऐसा वर्णन क्यों नहीं? जो भी हो, हजार रूपये की नैया है पालनहार प. बंगाल स्थित कार्तिक टोला निवासी फूलजोनी की जो सबेरा होते ही राजमहल आकर सब्जी बेचती है। झारखण्ड में अन्यत्र कहीं भी ऐसी नौका का प्रयोग नहीं होता है।