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भक्तों की आस्था का केन्द्र बासुकीनाथ

 

 
 

 


भक्तों की आस्था का केन्द्र बासुकीनाथ

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पंडित अनूप कुमार वाजपेयी, दुमका

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यह सच है कि एक लम्बे कालखंड तक भारत में बहुत से महत्वपूर्ण ऐतिहासिक-धार्मिक स्थलों को इतिहास में जगह नहीं मिली, परन्तु लोगों की जुड़ी आस्था ने ऐसे स्थलों की महत्ता को कम होने नहीं दिया। इतिहास के पन्नों में वंचित रहे स्थलों में शामिल है बासुकीनाथ का मंदिर भी, जो झारखण्ड राज्य के दुमका जिला में अवस्थित है। 1910 ई0 में एल एल ओ एस मेल्ले का प्रकाशित किया गया डिस्ट्रिक्ट बेंगॉल गजैटियर्स संताल परगनाज हो या फिर फ्रांसिस बुकानन का यात्रा-वृत्तांत, इनमें बासुकीनाथ मंदिर का उल्लेख नहीं मिलता, जो कलमकारों द्वारा इस स्थल के प्रति उपेक्षा भाव ही दर्शाता है। इतना ही नहीं, कल्याण नामक महत्वपूर्ण धार्मिक पत्रिका का 1932 ई0 में प्रकाशित विशेषांक शिवांक में भी इस बासुकीनाथ मंदिर का उल्लेख नहीं है। शिवांक में उल्लेख न होने के पीछे का कारण यह प्रतीत होता है कि भारत के कई विभिन्न क्षेत्रों से लेखकों ने उसमें प्रकाशित होने के लिये आलेख भेजा था, परन्तु बासुकीनाथ क्षेत्र के किसी भी लेखक ने इस मंदिर की ओर कल्याण के संपादक का ध्यानाकर्षण नहीं किया। बावजूद इसके एक लम्बे कालखंड से भक्तों की आस्था के कारण ही इस मंदिर ने अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर अपनी पहचान दर्ज करायी, जहाँ प्रतिवर्ष सावन माह में लाखों श्रद्धालु सुल्तानगंज स्थित उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र जल लेकर पैदल चलते हुए 105 किलोमीटर दूरी तय कर बासुकीनाथ पहुँचते हैं और यहाँ के मंदिर में शिवलिंग पर जलार्पण करते हैं। भारत के प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिगों में दुमका जिला के इस बासुकीनाथ का भी महत्व है। बासुकीनाथ मंदिर परिसर के निकट ही शिवगंगा नाम से प्रसिद्ध एक बड़ा तालाब है, जिसके अन्दर एक बड़ा गड्ढा है। इस गड्ढा में भी एक शिवलिंग तथा एक शिलालेख भी है। जब-जब शिवगंगा की सफाई हुई है, लोगों ने उक्त शिवलिंग के अलावा शिलालेख को भी देखा है। उक्त शिलालेख पर लिखी हुई बातों के अनुसार बासुकीनाथ के शिवगंगा का निर्माण कम से कम चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुआ था। बासुकीनाथ मंदिर की बनावट और इसके निर्माण में लगी कच्ची मिट्टी की पतली-पतली ईंटों के अलावा कई ऐसे साक्ष्य हैं, जिनके आधार पर प्रमाणित होता है कि यह मंदिर प्राचीन है। द्वादशज्योतिर्लिंगस्तोत्र के अनुसार :'याम्ये सदंगे नगरेऽतिरम्येविभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः।सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकंश्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये।।'अर्थात् जो दक्षिण के अत्यन्त रमणीय सदंग नगर में विविध भोगों से सम्पन्न होकर सुन्दर आभूषणों से भूषित हो रहे हैं, एकमात्र जो ही सद्भक्ति और मुक्ति को देने वाले हैं, उन श्रीनागनाथ की मैं शरण में जाता हूँ।स्पष्ट है कि स्तोत्र में दक्षिण भारत के भक्त द्वारा रचित उक्त पंक्तियों में जिस अंग देश की चर्चा की गयी है, उस अंग देश का ही भाग दुमका जिला सहित भारत का भागलपुर प्रमंडल है। दुमका जिला संताल परगना प्रमंडल अन्तर्गत अवस्थित है। भूगोल पर रेखाएँ खिँच जाने से भले ही बासुकीनाथ मंदिर नवसृजित राज्य झारखण्ड में है, मगर यहाँ अर्पित करने के लिये भक्त गंगाजल तो बिहार राज्य स्थित अंग देश के ही एक भाग से लाते हैं। बासुकीनाथ शिवलिंग को नागेश नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि बासुकीनाथ फौजदारी बाबा हैं, जहाँ भक्तों की मनोकामनाएँ शीघ्र पूरी होती हैं। यही कारण है कि यहाँ पहुँचने वाले भक्त दूर से मंदिर का गुम्बज देखते ही श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं।

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ओम शांति भवन में मुरली का पाठ सुन धन्य हुए अनुयायी


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दुमका, 4 नवम्बर 2013, वेबअखबार। दुमका शहर के नगरपालिका चौक स्थित ओम शांति भवन में मुरली का पाठ सुनकर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के अनुयायियों के साथ नगर परिषद् की अध्यक्ष अमिता रक्षित भी अपने को धन्य महसूस कर रही थी। श्रीमती रक्षित ने अपने संबोधन में भी इसका जिक्र किया। यहां 1 नवम्बर को बोकारो से आयी ब्रह्मकुमारी कुसुम दीदी द्वारा मुरली का पाठ किया गया था। मौका था प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय दुमका शाखा के नवनिर्मित भवन (ओम शांति भवन) में गृह प्रवेश का। गृह प्रवेश माउंट आबू से आई ब्रह्माकुमारी कैलाश माता एवं ब्रह्माकुमारी सुमन दीदी, बोकारो से आई ब्रह्माकुमारी कुसुम दीदी, स्थानीय आश्रम दुमका की ब्रह्माकुमारी जयमाला दीदी, मुख्य अतिथि नगर परिषद्, दुमका की अध्यक्ष अमिता रक्षित एवं उपस्थित अनुयायियों ने नारियल फोड़ व पूजन कर किया। इस अवसर पर जहां कुसुम दीदी द्वारा बाबा का मुरली पाठ किया गया, वहीं मुरली पाठ के बारे में सुमन दीदी द्वारा बताया गया कि बाबा का उपदेश मुरली- आत्मा के ज्ञान का खुराक है और मुरली पढ़ने-सुनने से आत्मा, मन स्वथ और तन सुदंर होता है। सुमन दीदी ने धनतेरस के महत्त्व को बताते हुए तेरह धनों के बारे में भी विस्तार से बताया। स्थानीय ब्रह्माकुमारी जयमाला दीदी ने अपने संबोधन में सबों के प्रति आभार प्रकट किया और कैलाश माता, कुसुम दीदी एवं सुमन दीदी से प्रेरणा लेकर ज्ञान बाँटने और इनके ऐसा लक्ष्य को प्राप्त करने का आह्वान किया। इस अवसर पर रिया द्वारा मनमोहक स्वागत गीत और तृप्ति बहन द्वारा नृत्य प्रस्तुत किया गया था।
सभी नामों में बड़ा प्यारा नाम हैं ‘सीताराम’

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(दुमका के धर्मस्थान स्थित मंदिर में भगवान श्रीराम व माता सीता की प्रतिमा व तस्वीर )

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रामनवमी पर पंडित अनूप कुमार वाजपेयी का शोध आलेख

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दुमका, 18 अप्रैल 2013, वेबअखबार। ‘सेवते इति सीता’। अर्थात् जो जगत की सेवा करती है, वही सीता है। ‘रमते यः सः रामः’। यानी जो संपूर्ण जगत् में रम रहा हो, वही राम है। यही कारण है कि सीता-राम नाम का हमेशा उच्चारण करते है शिव सहित विभिन्न देवता। यह दीगर बात है कि लंका विजय अभियान के पूर्व राम ने सागर किनारे शिवलिंग स्थापित कर पूजा की, परन्तु अविनाशी शंभु तो समाधिस्थ हो जाते है राम नाम जपते हुए ही। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि कलियुग में तो केवल नाम जपकर ही मनुष्य भवसागर से पार उतर जाता है। सनातन संस्कृति वालों के शरीर की अंतिम यात्रा भी ‘राम नाम सत्य है’उद्घोष के साथ होती है। हो भी क्यों न ? आखिरकार देवनागरी वर्णमाला के स्वर और व्यंजन में जो स्थान सीताराम का है, वह स्थान दुनिया के अन्य किसी भी दूसरे नाम का नहीं। जरा सीता शब्द की महत्ता पर गौर करें : स्वर का अ पहला अक्षर है। अ से लेकर लृ तक क्रमशः 14 अक्षर है। व्यंजन का क पहला अक्षर है। क से लेकर ढ तक क्रमशः 38 अक्षर है। सीता शब्द की विशेषता यह है कि स व्यंजन के 32 वीं संख्या पर है, ी स्वर की चौथी, त व्यंजन की 16 वीं तथा ा स्वर की दूसरी संख्या है। इस प्रकार 32+ 4+16+2= 54 हुआ। राम शब्द की भी महत्ता देखी जा सकती है। राम का र व्यंजन का 27 वां, ा स्वर का दूसरा और म व्यंजन का 25 वां अक्षर है। इस प्रकार 27+2+25 = 54 । इस आधार पर राम और सीता दोनों के 54-54 अंक बराबर है। 54+54 = 108 होता है। स्वर और व्यंजन में सीताराम नाम की उक्त महत्ता के कारण ही तुलसी के 108 मनके पर सीताराम नाम का जप कलियुग में बहुत ही प्रभावशाली है। 54 और 54 को जोड़ने पर 108 की हुई संख्या का सर्वांक अर्थात 1+0+8 = 9 होता है। राम का जन्म भी नवमी तिथि को हुआ था। महत्वपूर्ण बात यह है कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना नवमी तिथि को ही प्रारंभ की थी और 3 वर्षो के बाद नवमी तिथि को ही यह पूर्ण भी हुआ। यही कारण है कि रामचरितमानस में कुल 9999 चौपाईयों की रचना की गयी। इस वर्ष 19 अप्रैल को नवमी का वह शुभ दिन है, जिस दिन सीताराम नाम का जप और अनुष्ठान से अभिष्ठ की प्राप्ति की जा सकती है।

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विषुवा पर्व में मंदिरों में चढ़ा सत्तु

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संताल परगना सहित अंग में विषुवा का अंदाज ही अलग
हजारों लेटे भक्तों पर चलकर पुजारी प्रवेश करते है चुटोनाथ मंदिर में (बाबा बासुकिनाथ को सत्तु चढ़ाते पुरोहित )

(बासुकिनाथ में माता पार्वती को सत्तु चढ़ाते पुरोहित )

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दुमका/बासुकिनाथ, 14 अप्रैल 2013, वेबअखबार। विषुवत् संक्रांति के अवसर पर संताल परगना सहित प्राचीन अंग में मनाया जाने वाला विषुवा पर्व एक अलग अंदाज का है। लोगों ने विभिन्न मंदिरों में जाकर इस अवसर पर रविवार को पूजा-अर्चना की और परंपरा के अनुसार विशेष कर जौ के अलावा चना का सत्तु खाया। बाबा वैद्यनाथ और सुप्रसिद्ध बाबा बासुकिनाथ मंदिर में पंडा द्वारा सत्तु चढ़ाने के बाद इस क्षेत्र के भक्तों ने भी भगवान को सत्तु का भोग लगाया, वहीं दूसरी ओर दुमका जिला के झंझरा पहाड़ी की जद्दी के पास स्थित चुटोनाथ मंदिर तक मीलों दूर स्थित ग्रामीण मशाल लेकर देर शाम तक आते रहे। महिलाएं माथे पर जल भरे नये घड़े लेकर पहुंचीं, जो सोमवार की सुबह अपने परिवार के साथ सत्तु खायेंगी और इस घड़े के जल को पीयेंगी, मगर इसके पूर्व यहां पहुंचे हजारों श्रद्धालु भोर को चुटोनाथ शिव मंदिर का पंचामृत प्रसाद स्वरूप ग्रहण करने के बाद ही अपना उपवास तोड़ेंगे। विषुवा पर्व में पूरी रात यहां हैरतअंगेज कई प्रकार का विधान प्रतिवर्ष होने के कारण चुटोनाथ एक तंत्र स्थल के रूप में विख्यात हो गया है। यहां पहुंचे श्रद्धालुओं में हजारों पुरूषों द्वारा जिन्हे भक्तिया कहा जाता है, परंपरानुसार रात में आग के अंगारों पर चलने के अलावा कई भक्तिया कटरंगनी के कांटे पर लेटेंगे और रात भर बड़े-बड़े ढोलक और घंटी की लय पर सामुहिक नृत्य करेंगे। इस क्षेत्र के भक्तिया का एक दल यहां झूमते-नाचते हुए माथा पर पेड़ की एक मोटी टहनी भी लेकर पहुंचा है। मंदिर के प्रधान पुजारी पंडित फूलेश्वर पांडेय कहते है कि यह लकड़ी करीब सौ साल पुरानी है। इस लकड़ी को लोग वनेसर कहते है। एक सप्ताह तक वनेसर को माथे पर रखकर भक्त बस्ती-बस्ती घूमकर नाचते-गाते है और इसके बाद विषुवा पर्व के दिन इसे चुटोनाथ लाते है। भक्तों की आस्था यहां इतनी प्रगाढ़ है कि स्याह मध्य रात्रि में हजार से अधिक भक्तिया शिव मंदिर से लेकर कंकड़ीले, पथरीले, कटीले, उबड़-खाबड़ रास्ते में झंझरा पहाड़ के उपर तक पट होकर एक दूसरे से सटकर लेट जाते है। पहाड़ पर पुजारी पहाड़ ठाकुर नामक देवता की पूजा करते है और लेटे हुए भक्तिया की पीठ पर पैर रखते हुए मंदिर में प्रवेश करते है। भक्तों का मानना है कि स्वयं वन देवता पुजारी में प्रवेश कर जाते है। यही कारण है कि पुजारी के प्रति भक्त इतनी श्रद्धा रखते है। गोड्डा जिला के भक्त डॉक्टर सीताराम साह कहते है कि दुनिया का चुटोनाथ ही इकलौता ऐसा स्थाना है, जहां पुजारी हजारों लेटे हुए भक्तों पर चलते हुए मंदिर में प्रवेश करते है। अपनी खोज के आधार पर दुमका के पुरातत्वविद् पंडित अनूप कुमार वाजपेयी कहते है कि वनेसर शब्द वनेश्वर का अपभ्रंश रूप है। वास्तव में विषुवा पर्व के अवसर पर लोग वन देवता की पूजा करते है। यह लकड़ी प्रतीक है वन में विराजने वाले ईश्वर यानी भगवान शिव के स्वरूप का। विषुवा पर्व के अवसर पर यह पूरा इलाका हो उठता है शिवमय। अंग के कतिपय क्षेत्रों में इस अवसर पर विषहरी नामक देवी की भी पूजा होती है। मान्यता है कि विषहरी देवी साल भर लोगों की सांप, बिच्छु आदि विषैले जीवों से रक्षा करती है। जो भी हो, विषुवा हैं इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण पर्व, जो गर्मी के मौसम की शुरूआत होते ही घरों में शीतल जल संचित करने का भी संदेश देता है। पंडित फूलेश्वर पांडेय कहते है कि इसी कारण इस त्योहार के दिन लोग नया घड़ा खरीदने के अलावा घड़ा दान भी करते है, ताकि बेहद गरीब लोग भी गर्मी में प्यासे न रह जायें।

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जय मातादी के जयकारे से गुंजायमान हुई उपराजधानी

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जय माता दी सेवा समिति के विशाल भगवती जागरण में उमड़े श्रद्धालु

(भगवती जागरण के अवसर पर धर्मस्थान मंदिर में किया गया मां काली का श्रृंगार )

(जागरण स्थल पर सजा माता के दरबार में जलता ज्योत)

(माता की ज्योत शोभा यात्रा में दुमका नगर की चेयरमैन अमिता रक्षित व अन्य श्रद्धालु)

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दुमका, 13 अप्रैल 2013, वेबअखबार। झारखंड की उपराजधानी दुमका में शनिवार को विशाल भगवती जागरण का शुभारंभ माता की भव्य ज्योत शोभा यात्रा के साथ हुआ। ज्योत शोभा यात्रा दुमका शहर के सुप्रसिद्ध धर्मस्थान मंदिर से मां काली की श्रृंगारी पूजन के बाद निकाली गयी, जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालु मां शेरावाली का जयकारा लगाते हुए जागरण स्थल यज्ञ मैदान तक पहुंचे। देर रात तक चलने वाले इस भगवती जागरण में टी सीरिज के कलाकारों में कृष्णा मूर्ति, राधा रानी, कुमार सोनू, कुमारी रिया, मास्टर दीपक आदि भक्तों को माता दी के भक्ति गीतों से झुमाने आये हुए है। जय माता दी सेवा समिति, दुमका के तत्वावधान में आयोजित भगवती जागरण के इस पवित्र अवसर पर धर्मस्थान मंदिर और जागरण स्थल की फूलों इलेक्ट्रिक लाइटों से भव्य व आकर्षक सजावट की गयी है। जागरण को लेकर शहर के विभिन्न जगहों पर तौरण द्वार भी बनाये गये है जिस पर लगा इलेक्ट्रिक लाइटिंग आकर्षण केन्द्र बना हुआ है। कार्यक्रम के सफल संचालन में जय माता दी सेवा समिति दुमका के अध्यक्ष राजेश राउत, कोषाध्यक्ष अरूण केशरी, मीडिया प्रभारी कैलाश केशरी सहित अजय गुप्ता, आनंद केशरी, सूरज केशरी, सुमन साह, अमृत केशरी, अविनाश गुप्ता मोनू, मनीष मयंक, दीनानाथ सिंह आदि अहम भूमिका निभा रहे है। गौरतलब है कि जय माता दी सेवा समिति के तत्वावधान में दुमका में विशाल भगवती जागरण का यह 17 वां साल है।

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महाशिवरात्रि : धूमधाम से निकली बाबा की बारात

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( रसिपुर शिव गोपाल मंदिर से निकली बारात में भगवान भोलेनाथ )

( बारात में भगवान शिवशंकर व भूत-प्रेत का रूप धरे श्रद्धालु )

( बारात में भगवान शिवशंकर व भूत-प्रेत का रूप धरे श्रद्धालु )

( बासुकिनाथ मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ )

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दुमका/बासुकिनाथ धाम, 10 मार्च 2013, वेबअखबार। महाशिवरात्रि के अवसर पर रविवार को दुमका शहर स्थित शिव पहाड़ मंदिर और रसिकपुर शिव गोपाल मंदिर से भगवान भोलेनाथ की बारात गाजे-बाजे के साथ निकाली गयी। बारात में शिवभक्तों की भीड़ देखने लायक थी। दृश्य एकदम शिवलोक के समान। चारों ओर हर हर महादेव का जयकारा। बारात के साथ भगवान भूतनाथ के साथ भूत-प्रेतों का रूप धरे भक्त भी झूमते हुए चल रहे थे। रसिकपुर शिव-गोपाल मंदिर से बाबा की बारात रथ पर निकाली गयी थी। जबकि शिवपहाड़ से बाबा पालकी पर सवार होकर माता पार्वती से ब्याह रचाने निकले थे। यहां भी भक्तों की भीड़ देखने लायक थी। उधर सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल बासुकिनाथ धाम में पिछले वर्ष की तरह इस बार भी बाबा मंदिर के उपर दिन में चार्टर प्लेन से पुष्प वर्षा की गयी। बाबा पर पुष्प वर्षा दुमका के समाजसेवी प्रियेश सिंह उर्फ छोटू की ओर से की गयी। इसके लिए जमशेदपुर से चार्टर प्लेन व फूल कोलकाता से मंगवाया गया था। महाशिवरात्रि पर बासुकिनाथ धाम में बाबा की भव्य बारात देर रात निकालने की तैयारी की गयी है। महाशिवरात्रि को लेकर आज बासुकिनाथ धाम सहित अन्य शिव मंदिरों में पूजा अर्चना के लिए दिन भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।

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सज गया शिरडीधाम में साईं का दरबार, उमड़ी भीड़

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(शिरडीधाम श्री साईं मंदिर में सजा साईं बाबा का दरबार व श्रद्धालु)

(साईं बाबा की आरती करते शिरडी से आये प्रमोद मेढ़ी जी व अन्य)

(साईं बाबा की आरती में शामिल श्रद्धालु)

(भक्तों के बीच भंडारा का प्रसाद वितरण करते पूर्व डिप्टी सीएम हेमंत सोरेन)

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शिरडीधाम (दुमका), 15 फरवरी 2013, वेबअखबार। झारखंड के दुमका शहर से चार किलोमीटर दूर शिरडीधाम, ननकु कुरूवा में नवनिर्मित श्री साईं मंदिर में आयोजित तीन दिवसीय पूजन अनुष्ठान का शुक्रवार को अंतिम दिन था। आज मंदिर में उमड़े भक्तों ने बाबा का प्रथम दर्शन किया। इससे पूर्व पूरे विधि विधान के साथ मंदिर में स्थापित शिरडी वाले श्री साईं बाबा की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान पूरा किया गया। आरती में भक्तों के साथ शिरडी समाधि मंदिर के पूर्व प्रधान पुजारी प्रमोद मेढ़ी जी भी शामिल हुए। आज दिन भर भंडारा का भी आयोजन किया गया था, जिसमें एक बड़ी संख्या में भक्तों ने हिस्सा लेकर बाबा का प्रसाद ग्रहण किया। मौके पर सूबे के पूर्व उपमुख्यमंत्री विधायक हेमंत सोरेन ने भी अपने हाथों से भक्तों के बीच भंडारा का प्रसाद वितरण किया। देर शाम मंदिर परिसर में रात्रि जागरण का आयोजन शुरू हुआ, जिसमें अपने दल के साथ शिरडी से आये प्रमोद मेढ़ी जी ने साईं भजन पर भक्तों को खूब झुमाया। श्री साईं समाज दुमका के तत्वावधान में आयोजित इस पावन अनुष्ठान में संताल परगना एवं देश के विभिन्न हिस्सों सहित विदेश में भी रहने वाले कई साईं भक्त शामिल हुए। रात्रि जागरण, बाबा की आरती, दर्शन पूजा व भंडारा में भक्तों की भीड़ देखने को बन रही थी। इसमें हर उम्र के महिला-पुरूष व बच्चे शामिल थे। श्री साईं समाज दुमका के प्रमुख प्रो0 मदनेश्वर चौधरी के मुताबिक 16 फरवरी से प्रतिदिन मंदिर में शिरडी की ही तरह श्री साईं बाबा की चारों पहर आरती की जायेगी।

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झारखण्ड के बन्दनवार में होती है सरस्वती के साथ लक्ष्मी और तुलसी की भी पूजा

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(सरस्वती के साथ लक्ष्मी और तुलसी की मूर्ति)

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पं0 अनूप कुमार वाजपेयी, दुमका
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14 जनवरी 2013, वेबअखबार। बदलती परम्पराओं के साथ अब बदल रहे हैं देवताओं की मूर्तियों के स्वरूप भी। यही कारण है कि शहरों में होने वाली सरस्वती पूजा की मूर्तियों में भी पिछले कुछ सालों से बदलाव देखने में आ रहा है। अब माँग के अनुरूप कलाकारों को मूर्तियाँ बनानी पड़ रही हैं। राजहँस के बदले सरस्वती की मूर्ति के पास बत्तख (छोटी गर्दन वाला हंस) उनके वाहन के रूप में स्थान ले रहा है। दुनियाँ में राजहँस अब गिने-चुने ही बचे हैं। हँसवाहिनी के बदले लोग बत्तखवाहिनी की तो पूजा करने ही लगे हैं, साथ ही मूर्तियों के वास्तविक रंग में भी पूर्णतः बदलाव आ जाय तो आश्चर्य नहीं। हम आराधना करते हैं :
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।
अर्थात् जो कुन्द के पुष्प, चन्द्रमा, बर्फ और हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र कपड़े पहनती हैं, जिनके हाथ उत्तम वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमलासन पर बैठती हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा स्तुति करते हैं और जो सब प्रकार की जड़ता हर लेती हैं, वे भगवती सरस्वती मेरा पालन करें। सरस्वती का रंग श्वेत है, मगर अब अलग-अलग रंगों की भी प्रतिमाएँ बनायी जाती हैं। बावजूद इसके भक्तों को तो चाहिये श्वेतवर्णा हंसवाहिनी की ही प्रतिमा। यही कारण है कि कलाकार अनगिनत पीढ़ियों से भक्तों की भावना से बंधे होने के कारण विभिन्न देवताओं के वास्तविक रंग-रूप को अब भी मूर्तियों के माध्यम से बता पाने में सक्षम हैं। साथ ही परम्पराओं को संजोये रखने में विशेषकर सक्षम हैं ग्रामीण क्षेत्रों के भक्त। झारखण्ड के गोड्डा जिला में एक ग्राम है बन्दनवार। सरस्वती पूजा अवसर पर प्रतिवर्ष तीन दिनों का मेला लगता है इस ग्राम में। लोग बड़ी ही धूम-धाम से सरस्वती की पूजा करते हैं यहाँ। इलाके भर के बच्चों का विद्या का आरम्भ भी प्राचीन परम्परा के अनुसार प्रतिमाओं के पास खल्ली से देवनागरी के आरम्भिक अक्षरों को पंडितों द्वारा हाथ पकड़कर लिखवाते हुए कराया जाता है। बिल्कुल ही पुरानी परम्परा के अनुरूप प्रतिवर्ष बनवायी जाती है यहाँ सरस्वती की प्रतिमा। बन्दनवार इस क्षेत्र का ऐसा ग्राम है जहाँ सरस्वती के साथ लक्ष्मी और तुलसी नामक देवी की भी प्रतिमा स्थापित की जाती है। परम्परा के अनुसार भक्त जहाँ विद्या के लिये सरस्वती की आराधना तो करते ही हैं, साथ ही धन की देवी लक्ष्मी की भी पूजा करने में पीछे नहीं हैं। इतना ही नहीं, आदर्श जीवन पाकर अपने अर्जित सद्गुणों को समाज में बाँटने की मनोकामना के उद्देश्य से लोग तुलसी देवी की भी पूजा करते हैं। धर्मग्रंथों के अनुसार जालन्धर नामक एक दैत्य की पत्नी थी वृन्दा। जालन्धर को विष्णु ने मार दिया था और वृन्दा ने शोक में प्राण त्याग दिया था। वृन्दा को विष्णु ने यह वरदान दिया था कि वह तुलसी के पौधों के रूप में अवतरित होगी, जिसकी पूजा घर-घर होगी। इससे सम्बन्धित कथा अलग से एक विस्तृत परिचर्चा का विषय है, मगर सरस्वती के साथ लक्ष्मी और तुलसी की भी बन्दनवार ग्राम में पूजा होना एक अनूठी परम्परा है।

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भक्तों की आस्था का केन्द्र बासुकीनाथ
 
 
 
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