श्रद्धा और सबूरी में बसती है साईं भक्ति, लक्ष्मी दे ने व्रत पूरा होने पर श्रद्धालुओं के बीच बांटा प्रसाद
दुमका। साईं बाबा की भक्ति केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्वास, धैर्य और समर्पण के उस भाव का नाम है, जो इंसान को हर परिस्थिति में उम्मीद के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। साईं बाबा का संदेश ‘श्रद्धा और सबूरी’ आज भी लाखों भक्तों के जीवन का आधार है। इसी आस्था और विश्वास की एक सुंदर झलक गुरुवार को दुमका शहर के श्री बजरंगबली लोकनाथ साईं मंदिर में देखने को मिली, जहां बाबूपाड़ा निवासी लक्ष्मी दे ने साईं बाबा के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और समर्पण को सेवा के रूप में अभिव्यक्त किया। लक्ष्मी दे पिछले पांच वर्षों से शिरडी वाले साईं बाबा की भक्ति में लीन हैं। गुरुवार को साईं बाबा का व्रत पूरा होने के अवसर पर उन्होंने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इसके बाद मंदिर में दर्शन करने आए श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद और साईं बाबा व्रत कथा की पुस्तकों का वितरण किया। उनके चेहरे पर संतोष और हर्ष का भाव था, तो मन में बाबा के प्रति अगाध विश्वास। उनके लिए यह अवसर केवल व्रत की पूर्णता नहीं, बल्कि बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने और उनकी महिमा को दूसरों तक पहुंचाने का भी था।
‘श्रद्धा और सबूरी का ही नाम है साईं’
साईं बाबा के प्रति अपनी आस्था के बारे में लक्ष्मी दे ने कहा कि श्रद्धा और सबूरी का ही नाम साईं है। बाबा सबकी बिगड़ी बनाते हैं। उनकी कृपा से कठिन परिस्थितियों में भी रास्ते निकलते हैं और जीवन में उम्मीद बनी रहती है। हालांकि, इसके लिए मन में सच्ची श्रद्धा और धैर्य का होना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि बाबा पर विश्वास रखने वाला व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखना सीखता है।लक्ष्मी दे की भक्ति में विश्वास के साथ सेवा का भाव भी जुड़ा हुआ है। मंदिर पहुंचे श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद बांटना और साईं बाबा की व्रत कथा की पुस्तकें वितरित करना इसी भावना का प्रतीक है। उनकी मान्यता है कि बाबा के संदेश और उनकी महिमा का प्रसार करने से दूसरे लोगों को भी आध्यात्मिक प्रेरणा मिलती है।
बाबा के बुलावे का इंतजार, शिरडी दर्शन की अभिलाषा
साईं बाबा के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त करते हुए लक्ष्मी दे ने कहा कि उनकी इच्छा शिरडी जाकर बाबा के दर्शन करने की है। उन्हें विश्वास है कि जब बाबा का बुलावा आएगा, तब उन्हें शिरडी में साईं बाबा के दर्शन का सौभाग्य अवश्य प्राप्त होगा। फिलहाल, दुमका के मंदिर में पूजा-अर्चना और सेवा के माध्यम से वह अपनी भक्ति को निरंतर आगे बढ़ा रही हैं।लक्ष्मी दे की यह आस्था बताती है कि भक्ति का वास्तविक स्वरूप केवल मनोकामना मांगने में नहीं, बल्कि विश्वास बनाए रखने, धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने और दूसरों के साथ प्रसन्नता बांटने में भी है। साईं बाबा का ‘श्रद्धा और सबूरी’ का संदेश उनके जीवन में इसी रूप में दिखाई देता है। मंदिर में प्रसाद और व्रत कथा की पुस्तकें बांटते हुए उनकी भक्ति ने यह संदेश दिया कि सच्ची श्रद्धा जब सेवा से जुड़ती है, तो वह दूसरों के मन में भी आध्यात्मिक विश्वास और सकारात्मकता जगाती है। ##### webakhbar.com
