दुमका। शहर के एक तालाब के किनारे गुरुवार को एक ऐसा वाकया सामने आया, जिसमें श्राद्ध, दान, गाय की खरीद-बिक्री और मालिकाना हक के विवाद ने मिलकर हास्य और हैरानी का पूरा इंतजाम कर दिया। मामला कुछ ऐसा था कि किसी के स्वर्गवासी पिता के श्राद्ध पर पंडित जी को दान में गाय मिलने वाली थी, लेकिन दान की रस्म पूरी होने से पहले ही कहानी में एक नया किरदार आ गया और पूरी पटकथा बदल गई। दरअसल, एक सज्जन अपने दिवंगत पिता के श्राद्ध कर्म के लिए गाय लेकर पहुंचे थे। उनकी मंशा थी कि धार्मिक परंपरा के अनुसार गाय दान कर पुण्य अर्जित किया जाए। लेकिन पंडित जी को गाय दान में मिलती, उससे पहले ही एक बाहरी व्यक्ति वहां पहुंच गया। उसने गाय को देखते ही दावा कर दिया कि यह गाय उसकी है, जो काफी समय से गायब चल रही थी। अब श्राद्ध करने वाले सज्जन के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया। उन्होंने बताया कि गाय उन्होंने बाकायदा खरीदी है और गाय बेचने वाले का मोबाइल नंबर भी उनके पास है। विवाद बढ़ता देख गाय बेचने वाले को मौके पर बुलाया गया। लेकिन उसके जवाब ने मामले को और दिलचस्प बना दिया। उसने बताया कि गाय उसने भी किसी दूसरे व्यक्ति से खरीदी थी। आशंका जताई गई कि कहीं उसे किसी ने चोरी की गाय तो नहीं बेच दी! इसके बाद घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया कि गाय को अपना बताने वाला व्यक्ति गाय लेकर चलता बना। इधर, गाय बेचने वाले को श्राद्ध करने वाले सज्जन के पैसे लौटाने पड़े। इस तरह विवाद तो शांत हो गया, खरीदार को उसकी रकम वापस मिल गई और गाय अपने कथित असली मालिक के साथ चली गई।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा झटका पंडित जी को लगा! श्राद्ध कर्म में दान के लिए आई गाय आखिरकार उनके हाथ नहीं लगी। उम्मीद थी कि गाय दान में मिलेगी, मगर न गाय मिली और न उसे अपने साथ ले जाने का अवसर। बेचारे पंडित जी के हिस्से में आखिर क्या आया, यह तो वही जानें, लेकिन गाय के इस गोलमाल ने वहां मौजूद लोगों को चर्चा का एक नया विषय जरूर दे दिया।
इस घटना ने एक बार फिर याद दिलाया कि गाय हो या कोई अन्य पशु, खरीदारी हमेशा विश्वसनीय व्यक्ति से करनी चाहिए। पशु खरीदते समय उसके मालिकाना हक की पुष्टि करना, खरीद-बिक्री की रसीद लेना और विक्रेता की पहचान व संपर्क विवरण सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। केवल मोबाइल नंबर होना ही पर्याप्त सुरक्षा नहीं है। आखिरकार, बिना सही जांच-पड़ताल के की गई खरीदारी कभी-कभी जेब पर भारी पड़ सकती है और धार्मिक कार्य में भी अप्रत्याशित बाधा बन सकती है।
और इस पूरे वाकये पर बस यही कहना बनता है—
चोर मचाए शोर, गोलमाल है भाई, सब जगह गोलमाल है! 😄
(नोट : यह समाचार उपलब्ध घटनाक्रम पर आधारित हास्य-व्यंग्यात्मक प्रस्तुति है। गाय के वास्तविक मालिकाना हक और चोरी होने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।) webakhbar.com