महाशक्ति दुर्गा ही परब्रह्म हैं, जो विविध रूपों में करती हैं विभिन्न लीलाएं
शास्त्रों में भगवती देवी की उपासना के लिये विभिन्न प्रकार वर्णित है। मान्यता है कि भगवती की साधना से सद्यः फल की प्राप्ति होती है। पराम्बा भगवती राजराजेश्वरी अपने भक्तों को भोग और मोक्ष दोनों एक साथ प्रदान करती हैं, जबकि सामान्यतः दोनों का साहचर्य नहीं देखा जाता। जहाँ भोग है वहाँ मोक्ष नहीं, जहाँ मोक्ष है वहाँ भोग नहीं रहता, फिर भी शक्ति साधकों के लिये दोनों एक साथ सुलभ है अर्थात् संसारके विभिन्न भोगों को भोगता हुआ वह परमपद मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। तात्पर्य यह कि परमात्मरूपा महाशक्ति ही विविध शक्तियों के रूप में सर्वत्र क्रीडा कर रही हैं-‘शक्तिक्रीडा जगत्सर्वम।’ जहाँ शक्ति नहीं, वहाँ शून्यता ही है। शक्तिहीन का कहीं भी समादर नहीं होता। धु्रव और प्रह्लाद भक्ति-शक्ति के कारण पूजित हैं। गोपियाँ प्रेमशक्ति के कारण जगत्पूज्य हुई हैं। हनुमान् और भीष्म की ब्रह्मचर्यशक्ति, व्यास और वाल्मीकि को कवित्वशक्ति, भीम और अर्जुन की शौर्यशक्ति, हरिचन्द्र और युधिष्ठिर को सत्यशक्ति, प्रताप और शिवाजी को वीरशक्ति, दधीचि और रन्तिदेव को उनकी दानशक्ति श्रद्धा और समादर का पात्र बनाती है। सर्वत्र शक्ति की ही प्रधानता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है ‘समस्त विश्व महाशक्ति का ही विलास है।’

अध्यक्ष,स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग,एसकेएमयू,दुमका