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राक्षसी शक्तियों का विनाश कर अपने भक्तों को रोग, शोक और दुःख से मुक्त करती है माँ दुर्गा

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  • डाॅ.धनंजय कुमार मिश्र
दुर्गा या आदिशक्ति भारतीय धर्म और आस्था की प्रमुख देवी हैं, जिन्हें जगदम्बा, नवदुर्गा, देवी, शक्ति, आद्या शक्ति, भगवती, माता रानी, जगज्जननी, परमेश्वरी, सुरेश्वरी, सती, साध्वी, भवानी, परम सनातनी देवी आदि कई नामों से जाना जाता है। दुर्गा स्वयं प्रकृति है। जीवन का आधार है।
भारतीय धर्म एवं दर्शन के तीनों मुख्य सम्प्रदायों के समन्वय की देवी दुर्गा हैं। शैव सम्प्रदाय की शिवा, वैष्णव सम्प्रदाय की वैष्णवी और शाक्त सम्प्रदाय की शक्ति का एकाकार रूप मां दुर्गा हैं।
शास्त्रों में भगवती दुर्गा को आदि शक्ति, परम भगवती, परब्रह्म परमेश्वरी कहा गया है। दुर्गा अंधकार व अज्ञानता रुपी राक्षसों से रक्षा करने वाली, ममतामयी, मोक्षदा तथा कल्याणकारिणी हैं। शास्त्रीय मान्यता है कि शान्ति, समृद्धि तथा धर्म पर आघात करने वाली राक्षसी शक्तियों का दुर्गा देवी विनाश करतीं हैं।
वेदों, उपनिषदों और पुराणों के अनुसार समग्र ईश्वरीय तत्त्वों की एकात्मकता का अपर नाम आद्या शक्ति है। ब्राह्मी, माहेश्वरी, एन्द्री, वारुणी, वैष्णवी आदि देवी दुर्गा ही हैं। सृजन, पालन और लय इनके गोद में खेलते हैं। सकारात्मक ऊर्जा की स्रोत स्वरूपा भगवती दुर्गा सौम्य और उग्र उभयरुपा हैं।
भगवती दुर्गा सनातनी देवी हैं। धर्म की रक्षा व पापियों को दण्ड देने के लिए विविध रूपों में प्रकट होती हैं। महिषासुर नामक राक्षस को मारकर देवताओं को इससे मुक्ति दिलाई और महिषासुरमर्दिनी कहलायी। महामाया माँ जगदंबिका ने देवताओं को वरदान दिया था कि वो भीषण अनिष्टप्रद समय में प्रकट होकर दैत्यों का नाश करेगी। माता नित्य होती हुई भी बार-बार प्रकट होती है। अपनी लीला का विस्तार करने के कारण सभी देवी देवताओं के तेज से प्रकट होकर दुष्ट महिषासुर का अंत किया। इसके बाद भी कई और दानव पृथ्वी पर उत्पन्न हुए, जैसे-मधु कैटभ, चण्ड-मुण्ड, धूम्रलोचन, रक्तबीज, शुंभ-निशुंभ आदि। इन सभी का वध करने के लिए माँ ने देवी का रूप धारण किया। द्वापर युग में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हुई। वसुदेव जी ने कृष्ण को गोकुल में रखकर इन्हें अपने साथ लेकर मथुरा आ गये। पापी कंस ने जब इस बालरुपा देवी को मारना चाहा तब दैवी रुप से आकाश में उड़ते हुए हिमालय पर्वत पर निवास किया। वहां दुष्टों का संहार किया इसलिए इनको निशुम्भशुम्भहननी भी कहा जाता है। माता ने अपनी भृकुटी से काली देवी को उत्पन्न किया। जिसने चंड मुंड का वध किया, जिसके कारण चामुंडा के नाम से उन्हें जाना जाने लगा। इन सबके बाद हिरण्याक्ष वंश में रुरू का एक पुत्र हुआ जिसका नाम था दुर्गमासुर जिसके पापों से पृथ्वी पर अकाल पड़ गया। तब सभी देवता मिलकर हिमालय पर्वत की शिवालिक पहाड़ियों में आए और मां जगदंबा की घोर तपस्या की। माता ने प्रसन्न होकर एक अद्भुत रूप धारण किया और सौं नेत्रों से जगत को देखा जिससे माता का शताक्षी नाम प्रसिद्ध हुआ। इन्हीं शताक्षी देवी ने अपने शरीर से शाक और सब्जियों को उत्पन्न किया और सभी प्राणियों का पालन-पोषण किया। तभी से इनका नाम शाकम्भरी देवी प्रसिद्ध हुआ। दुर्गमासुर द्वारा चुराए गए चारों वेद वापस लेने के लिए देवी ने घोर संग्राम किया और दुर्गम दैत्य का वध कर दिया जिनके कारण शाकम्भरी देवी दुर्गा देवी के नाम से भी प्रसिद्ध हो गई। इसके बाद हिमालय पर्वत पर तपस्वियों की रक्षा करने के लिए माँ ने एक भयानक रूप धारण किया और भीमा देवी के नाम से प्रसिद्ध हुई। वैप्रचित्त नामक दैत्य का संहार कर रक्तदंतिका कहलाई। जब अरूणासुर ने तीनों लोकों को आतंकित किया तब माता ने असंख्य भ्रमरों का रूप धारण कर उस दैत्य का वध किया। तब इस रूप में देवी को भ्रामरी देवी कहा जाने लगा।
माता रानी इस धरती पर हमेशा पापियों का संहार किया करती है। रोग, शोक और दुःख से भक्तों को मुक्त करती हैं। मां दुर्गा अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। देवी माँ की आराधना सदैव कल्याणकारी है।
डॉ.धनंजय कुमार मिश्र
(अध्यक्ष संस्कृत विभाग, सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका)
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