
पुरातत्त्वविद् सह लेखक
“दरिद्दर बहार रे, लक्ष्मी भीतर रे!” — दीपावली की रात्रि समाप्त होने से पूर्व प्रत्येक वर्ष पूर्वी भारत के अङ्गक्षेत्र में यह शोर सुनाई पड़ता है। दरिद्रता को घर से बाहर करने की लोकमान्यता के तहत् ब्रह्ममुहूर्त में प्रत्येक घर से बाल-वृद्ध कोई पुरुष इस उद्घोष के साथ टूटा हुआ सूप अथवा डलिया छड़ी से पीटता हुआ बाहर निकलता है और कुछ दूर ले जाकर उसे फेंक आता है। लौटते समय वह पीछे मुड़कर नहीं देखता। लोकविश्वास है कि पीछे मुड़कर देखने से खेदकर भगाया गया दारिद्र्य के पुनः घर में लौटने की सम्भावना रहती है। दारिद्र्य को बाहर करके लौटने वाले व्यक्ति के लिये घर में प्रवेश करने से पूर्व स्नान करना अनिवार्य माना जाता है। यह परम्परा न जाने कब से चली आ रही है।
अङ्गक्षेत्र की मानव-जीवनशैली पर दृष्टिपात करने पर प्रतीत होता है कि यहाँ के प्राचीन निवासियों का जीवन अभावों के बीच ही व्यतीत होता रहा होगा। आज भी अभावग्रस्त लोगों की कमी नहीं है। मुझे अङ्गक्षेत्र की धरती में एक अति प्राचीन सभ्यता के अवशेषों के साक्ष्य मिले हैं, जिनका उल्लेख मैंने अपनी अनेक पुस्तकों में किया है। इनमें दो पुस्तकें विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। उनमें से मार्च, 2009 ईसवी में उप निदेशक, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, संताल परगना प्रमण्डल, दुमका (झारखण्ड सरकार) द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘राजमहल’ में प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए पृष्ठ सङ्खया 21 पर अङ्गक्षेत्र के बारे में लिखा है कि “यहाँ एक सभ्यता विनष्ट हुई और फिर शुरु हुआ प्रस्तर युग।”
दूसरी है 2018 ईसवी में समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली/मुजफ्फरपुर से प्रकाशित ‘विश्व की प्राचीनतम सभ्यता’ पुस्तक (आईएसबीएन : 978-93-87638-12-9) जो सिदो-कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका (झारखण्ड) के स्नातकोत्तर संस्कृत पाठ्यक्रम में 2019–21 ईसवी सत्र से सम्मिलित है। इसमें इस तथ्य से भी सम्बन्धित उल्लेख है कि प्राचीन काल में मिट्टी के पात्रों का विशेष महत्त्व था। घरेलू उपयोग की अधिकांश वस्तुएँ मिट्टी से ही निर्मित होती थीं। अन्धकार दूर करने के लिये प्रकाश के साधनों में मिट्टी के दीपकों की प्रधानता थी।
अङ्गक्षेत्र के मुख्यतः गङ्गा-तटवर्ती राजमहल-क्षेत्र में चीनी मिट्टी प्राप्त करने के लिये श्रमिकों द्वारा धरती की खुदायी के दौरान प्राचीन सभ्यता के अवशेष बाहर आते ही रहते हैं। मैंने ऐसे अनेक नमूनों का सङ्कलन किया है जो मिट्टी से निर्मित हैं। इनमें कई दीपक भी सम्मिलित हैं, जिनकी बनावट वर्तमान समय में प्रचलित दीपकों से सर्वथा भिन्न है। इन सभी के पेन्दे बिलकुल चपटे हैं तथा किनारों की ऊँचाई इतनी कम है कि इनमें अधिक तेल नहीं रखा जा सकता। इन दीपकों की बनावट और सीमित तेल-धारण क्षमता को देखकर सहज ही अनुमान होता है कि तत्कालीन मानव-जीवन में संसाधनों का अभाव रहा होगा। सीमित साधनों में ही प्रकाश की आवश्यकता पूरी करने के उद्देश्य से ऐसे दीपकों का निर्माण किया जाता रहा होगा। “विश्व की प्राचीनतम सभ्यता” पुस्तक की पृष्ठ सङ्खया 295 पर मैंने राजमहल क्षेत्र की एक खदान से चीनी मिट्टी सङ्ग बाहर आये चार प्रदीपों की छवियाँ दरशायी हैं, जो सुप्राचीन हैं। उन्हीं में एक की छवि यहाँ भी दी जा रही है।

अङ्गक्षेत्र में मुझे पाषाण-उपकरणों के अत्यन्त प्राचीन कारखानों के साक्ष्य भी मिले हैं। इनमें कुछ कारखाने तो कई कोस तक विस्तृत थे। वहाँ निर्मित असङ्ख्य उपकरण कालान्तर में विस्थापित हो गये, फिर भी जो अवशेष उपलब्ध हैं, उनकी सङ्ख्या भी अगणित है। मैंने इनके भी अनेक नमूने सङ्कलित किये हैं। अपने इस सङ्कलन के आधार पर मैं स्वयं को विश्व में सर्वाधिक पाषाण-उपकरण सङ्कलित करने वाला व्यक्ति मानता हूँ।
प्राप्त साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि पाषाण-युग के लोग भी भोजन पकाने, अन्धेरा भगाने आदि कार्यों के लिये अग्नि प्रज्वलित करते थे। उनमें अग्निप्रयोग से गुजरा काष्ठ-जीवाश्म भी है।
निःसन्देह, मेरे सङ्कलन के सभी दीपक अत्यन्त प्राचीन हैं। पाषाण-युग से लेकर आज के विकसित युग तक पहुँचने में मानव-समाज ने न जाने कितने सङ्घर्षों और कठिनाइयों का सामना किया होगा।
अङ्गक्षेत्र के गाँवों से आज भी दरिद्रता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यद्यपि पाषाण-युग से वर्तमान समय तक जीवन की परिस्थितियों में कुछ सुधार अवश्य हुआ है, बावजूद इसके चिर काल से चली आ रही लोकपरम्परा के निर्वहन में प्रत्येक वर्ष कार्तिक अमावस्या की रात्रि को हम अपने घर-आँगन को दीपों से आलोकित करते हैं और भोर होते ही दारिद्र्य को खेदने में ही सुख पाते हैं। इस लोकाचार के पीछे एक आशा निरन्तर जीवित रहती है कि आज नहीं तो कल लक्ष्मी की कृपा अवश्य बरसेगी। #####
✍️ लेखक का पता : आवास : ग्राम : बन्दनवार, जिला : गोड्डा (झारखण्ड) वर्तमान पता : नया पाड़ा, दुमका, (झारखण्ड) 814 101, मोबाइल दूरभाष : 9431177915