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शिक्षक दिवस पर विशेष : जब पाठ्यक्रम की पुस्तकें दुकानों में लन्दन से छपकर आती थीं

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  • पंडित अनूप कुमार वाजपेयी
प्राथमिक कन्या विद्यालय,बन्दनवार

पूर्वी भारत के अङ्ग क्षेत्र में जब मनोरञ्जन के साधनों में कौड़ी, गोटी, टुल्ली-डन्टा, कोना-कोना आदि ही प्रमुख थे, सरकंडे की डंठल की नोंक को स्याही में डुबोकर लिखते थे, कागज का अभाव था, पाठ्यक्रम की पुस्तकें दुकानों में लन्दन से छपकर आती थीं, गावों के लोगों को कण्टकाकीर्ण रास्ते पर चलने की बेबसी थी, प्राय: पैदल ही यात्रा करते थे, हिंसक वन्यजीव तो विचरते ही रहते थे, वैसी विषम परिस्थिति में भी मेरे गाँव बन्दनवार में प्राथमिक कन्या विद्यालय की स्थापना हो चुकी थी। स्थापना साल था १९२३ ईसवी। देखते ही देखते १९२५ में उस विद्यालय का सरकारीकरण भी हो गया। अत: इस विद्यालय-भवन पर स्थापना-साल वही लिखा दिखता है जो इसके सरकारीकरण होने का साल है।

यह विद्यालय इस बात को दर्शाता है कि विषम परिस्थितियों के बावजूद बन्दनवार वालों के लिये बालिका शिक्षा का भी कितना महत्त्व है। जब इसकी स्थापना हुई उस समय तक बन्दनवार की भूमि से संस्कृत, ब्रजभाषा, अवधि, खोरठा/अङ्गिका, हिन्दी आदि भाषाओं में अनेक काव्य-रचनाएँ हो चुकी थीं। ऐसे में यहाँ कन्या विद्यालय न होने से सरस्वती-साधक चैन से कैसे रह सकते थे? उनकी ही परिकल्पना की देन है कि आज भी इस विद्यालय में गाँव की बालिकाएँ शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। स्थापना काल से लेकर अबतक न जाने इस विद्यालय में कितनी शिक्षिकाएँ हुईं। मेरी सबसे बड़ी फूवा विद्योत्तमा देवी भी इसमें अध्यापिका थी। पारिवारिक दायित्व बढ़ने के कारण १९४९ ईसवी में इस विद्यालय को छोड़कर अपने गाँव लतौना चली गयी जहाँ रात्रि पाठशाला खोलकर गाँव की स्त्रियों को पढ़ाया करती थी। लोग खेत, टाँड़-टीकर, नदी, पोखर होकर तब बन्दनवार-लतौना पैदल ही आना-जाना करते थे। मैंने भी उसी पुराने रास्ते होकर अनेक बार पैदल जाना-आना किया है। यह दूरी लगभग एक कोस की है।

याद है मुझे मेरी भी पहली पाठशाला यही थी। बच्चे को बालक और बालिका विद्यालय में विभेद से क्या सरोकार? एक अनामांकित छात्र के रूप में मैं यह विद्यालय जाता रहा। मेरी तरह ही अनेक बालकों का आरम्भिक विद्यालय यही रहा है। कुछ समय बाद मैं बन्दनवार का मध्य विद्यालय जाने लगा। यह विद्यालय भी पुराना है। स्थापना १९१३ ईसवी में हुई थी। उस समय यह “लोवर प्राईमरी स्कूल” था। १९३५ ईसवी में इसे मध्य विद्यालय का रूप दिया गया जिसका बाद में सरकारीकरण हो गया।

बन्दनवार के मुहाने पर १९६६ ईसवी से उच्च विद्यालय भी है, मगर इन सब विद्यालयों से बहुत पहले बन्दनवार के पास बारकोप में धनसूखा नामक पहाड़ी के पास लम्बे समय से एक प्राईमरी स्कूल सञ्चालित हो रहा था। मेरे प्रपितामह रामचरण बाजपेयी ने आरम्भिक शिक्षा उसी विद्यालय में पायी थी। उनका जन्म १८८५ ईसवी में हुआ था। जब मेरे प्रपितामह उसमें पढ़ने जाया करते थे तब उनके पिता गुरुचरण बाजपेयी उसमें शिक्षक थे। भारत स्वतन्त्र होते-होते बारकोप का वह विद्यालय बन्द होकर भूलुण्ठित हो गया, अवशेषरूप में वहाँ है एक कूप से सटा टीला, जिसपर मरम्मती साल १८९२ ईसवी लिखा दिखता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी बन्दनवार के लोगों ने शिक्षा को बहुत महत्त्व दिया। यही कारण है कि अर्थाभाव के बावजूद यहाँ साहित्यसृजन होता रहा। अगर केवल इकीसवीं सदी पर ही दृष्टि दौड़ायें तो पाता हूँ कि इस गाँव के लेखकों की पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनपर लिखा जाय तो विशाल शोध-पुस्तक बन सकती है।

मैं तत्कालीन एवं वर्तमान शिक्षानक्षत्ररूपी शिक्षक-शिक्षिकाओं को नमन करता हूँ जिनके कारण ज्ञानालोक का अस्तित्व विद्यमान् है। साथ ही बन्दनवार के सभी साहित्यकारों को भी नमन करता हूँ जिन्होंने अपनी बहुआयामी रचनाओं से साहित्य को समृद्ध किया है और नयी पीढ़ी से आशा करता हूँ कि इस रचनापरम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए बन्दनवार की वन्दनीयता बरकरार रखेंगे।

पंडित अनूप कुमार वाजपेयी
ग्राम : बन्दनवार, जिला – गोड्डा
आवास : नया पाड़ा, दुमका (झारखण्ड)

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