- पंडित अनूप कुमार वाजपेयी
संताल परगना पहले पश्चिम बंगाल में था, जिस कारण इस क्षेत्र के अधिकांश शिलालेख हैं बंग्ला भाषा में ही। कुछ शिलालेख संस्कृत, पाली, हिन्दी भाषा में भी हैं। देवनागरी, बंग्ला, पाली और कैथी लिपि में मिलने वाले यहाँ के शिलालेख शोध के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। कई शिलालेखों की विशेषता यह है कि इनमें बंग्ला और कैथी दोनों ही लिपि में पंक्तियाँ लिखी हुई हैं। बाबा बासुकीनाथ मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर भी एक शिलालेख है, जिसमें प्रारम्भ की तीन पंक्तियाँ बंग्ला और इसके बाद की तीन पंक्तियाँ कैथी लिपि में हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार का ऊपरी चौखट काले पत्थर से निर्मित है। इस पर कैथी लिपि में चार पंक्तियाँ लिखी हुई हैं, मगर भाषा है हिन्दी। प्रवेश द्वार के ऊपर और चौखट पर लिखी हुई बातों में छुपा है बाबा बासुकीनाथ मंदिर का इतिहास। इतना ही नहीं, मंदिर के निकट स्थित एक बड़ा पोखर जो शिवगंगा नाम से जाना जाता है, इसमें भी एक शिलालेख है। बाबा बासुकीनाथ को इस क्षेत्र के लोग नागेश ज्योतिर्लिंग भी मानते हैं। वैसे तो विभिन्न क्षेत्रों में और भी कई शिवलिंग हैं, जिन्हें अपने-अपने क्षेत्र के लोग नागेश ज्योतिर्लिंग मानते हैं। भारत में तीन और शिवलिंग हैं, जिन्हें उस क्षेत्र के लोग नागेश ज्योतिर्लिंग कहते हैं। इनमें पहला गुजरात के जामनगर जिला में, दूसरा निजाम हैदराबाद के औढ़ा ग्राम में और तीसरा अल्मोड़ा से 17 मील दूर उत्तर-पूर्व में यागेश (जागेश्वर) नाम से स्थित है। 1932 ई0 में गीता पे्रस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित कल्याण नामक पत्रिका का शिवांक नामक विशेषांक में अल्मोड़ा के निकट वाले यागेश (जागेश्वर) को ही नागेश ज्योतिर्लिंग बतलाते हुए लिखा गया है कि यह मंदिर आज का नहीं, बहुत पुराना सिद्ध होता है। आगे उल्लेख है कि अनेक प्रकार के प्रमाणों के आधार पर नागेश ज्योतिर्लिंग भी यही सिद्ध होता है। कल्याण के विशेषांक में संताल परगना के बासुकीनाथ नामक स्थल में भी नागेश नाम के ज्योतिर्लिंग होने का कोई उल्लेख नहीं है। बावजूद इसके भक्तों की आस्था ने इस स्थल को अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर ला खड़ा किया है। इसमें कोई दो मत नहीं कि अब से महज सौ वर्ष पूर्व तक मैदानी भाग में दुमका-देवघर मार्ग के किनारे स्थित बासुकीनाथ पहले बहुत ही घने जंगल में था। निःसन्देह यहाँ का शिवलिंग है अति प्राचीन। बहुत बाद में यहाँ मंदिर बना, साथ ही असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाने तथा सब ओर से निराश भक्तों की मनोकामना पूर्ण होने के अनेक दृष्टांतों के कारण बासुकीनाथ की ख्याति दूर तक हो गयी। बासुकीनाथ के विद्वान पंडित कन्हैय्यालाल पाण्डेय ‘ रसेश ’ सहित कई लेखकों ने अपने आलेखों के माध्यम से बासुकीनाथ को ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। रसेश यह भी कहते थे कि बासुकीनाथ के बदले वासुकिनाथ शब्द का प्रयोग होना चाहिये, जिस कारण 2005 ई0 से बाबा बासुकीनाथ को कुछ लोग बाबा वासुकिनाथ कहने भी लगे हैं। बाबा बासुकीनाथ को एक ओर जहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में दर्शाने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर क्षीर सागर मंथन में प्रयुक्त वासुकि नामक नाग के स्वामी के रूप में आलेखों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। शिवपुराण की कथा के अनुसार दारूक नामक वन में रहता था दारूक नामक राक्षस। यहीं रहती थी दारूका नामक राक्षसी भी। एक बार मनुष्यों से भरी नाव नदी के पार आयी, जिसे दारूक ने पकड़ लिया और उसमें सवार सभी मनुष्यों को कारागार में डाल दिया। इनमें सुप्रिय नाम का एक शिवभक्त भी था, जो आर्तस्वर से भगवान शिव को पुकारने लगा। पुकार सुन शिव ने प्रकट होकर उसे पशुपतास्त्र दिया, जिससे सुप्रिय ने किया राक्षसों का संहार। मान्यता है कि शिव जहाँ प्रकट हुए थे, वहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में उनकी पूजा होने लगी। बाबा बासुकीनाथ के साथ एक और कथा जुड़ी हुई है, जो शिवपुराण में नहीं है। इस कथा के अनुसार दारूक वन में सुप्रिय द्वारा राक्षसों का संहार करने के बाद से शिव लम्बे समय तक ज्योतिर्लिंग के रूप में यहाँ पड़े रहे। कालान्तर में एक बार भयानक अकाल पड़ा, जिस कारण कंद-मूल की तलाश में बसु नामक एक व्यक्ति यहाँ के घने वन में आया। एक कंद खोदकर बाहर निकालने के लिये जब उसने धरती पर अपनी खंती से प्रहार किया तो वह खंती एक शिवलिंग पर लग गयी। इसी समय आकाशवाणी हुई कि मैं नागनाथ हूँ। शिवलिंग पर खंती लगने की घटना से बसु बड़ा ही दुःखी हुआ और उसने इस नागनाथ नामक शिवलिंग की पूजा की। तब से यहाँ नागनाथ यानी नागेश ज्योतिर्लिंग की पूजा बासुकीनाथ नाम से अनवरत होती चली आ रही है। बासुकीनाथ मंदिर के अन्दर चौखट पर खुदी पंक्तियों में वासुकीनाथ शब्द भी है, जबकि मंदिर प्रवेश द्वार के ऊपर लगे शिलालेख की पंक्तियों में बासुकिनाथ अंकित है। प्रवेश द्वार के ऊपर लगे शिलालेख में कुल सात पंक्तियाँ हैं, जिनमें ऊपर की तीन पंक्तियाँ बंग्ला लिपि में तथा नीचे की तीन पंक्तियाँ कैथी लिपि में लिखी हुई हैं। सबसे नीचे की यानी अंतिम पंक्ति लगभग मिट जाने के कारण बिल्कुल ही अपठ्य है। मंदिर के चौखट पर कुल चार बड़ी-बड़ी पंक्तियाँ कैथी लिपि में खुदी हुई हैं, जिनमें बहुत से शब्द घिसकर बिल्कुल ही अपठ्य हो गये हैं। बावजूद इसके चौखट पर लिखी बातों से यह लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि 18वीं सदी के अन्त में बाबा बासुकीनाथ मंदिर का आस्तित्व था। दोनों ही शिलालेखों पर आगे इस लेखक द्वारा शोध कार्य जारी है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 1770 ई0 में बंगाल में भयानक अकाल पड़ा था, जिसमें मनुष्य की एक बड़ी आबादी मौत के भेंट चढ़ गयी थी। इलाके-का-इलाका उजाड़ हो गया था। अकाल से उत्पन्न स्थिति का वर्णन करते हुए 1779 ई0 में लॉर्ड कार्नवालिस ने यह लिखा था कि बंगाल की एक तिहाई भूमि जंगल हो गयी है, जो भयंकर जानवरों का आवास बन चुकी है। उल्लेखनीय है कि कंद-मूल की तलाश में खंती से खोदने के क्रम में बाबा बासुकीनाथ का शिवलिंग अनायास ही बसु ने देखा था। बासुकीनाथ से अटूट लगाव है भक्तों का। यही कारण है कि गोड्डा जिला के लतौना ग्राम निवासी अशोक कुमार दूबे नामक एक भक्त ने 52 साल तक बाबा बासुकीनाथ का नाम पुस्तिकाओं में 80 लाख बार लिख डाला। अशोक कुमार दूबे के अनुसार लगभग 22 लाख, 37 हजार, 698 बार बाबा बासुकीनाथ का नाम इनके पिता स्व0द्विजेन्द्र प्रसाद दूबे ने लिखा था। अपने पिता से प्रेरणा लेकर इन्होंने अपनी 72 वर्ष उम्र तक बाबा बासुकीनाथ नाम के पुस्तिकाओं की ढेर लगा दी। इतना ही नहीं, इनके पिता से प्रेरणा लेकर लतौना ग्राम के रोहित मिर्धा नामक एक युवक ने भी बाबा बासुकीनाथ का लगभग 2 लाख नाम पुस्तिकाओं में लिख डाला। इस प्रकार कुल 85 लाख नामों वाली जप पुस्तिकाओं को अशोक कुमार दूबे ने इस लेखक को सुपूर्द कर दिया था। इन सभी पुस्तिकाओं को इस लेखक द्वारा 2008 ई0 में गंगा दशहरा के अवसर पर 13 जून को बाजे-गाजे के साथ बाबा बासुकीनाथ मंदिर में अशोक कुमार दूबे द्वारा अर्पित करा दिया था। इस दिन इस लेखक द्वारा बाबा बासुकीनाथ का भव्य श्रृंगार पूजन आयोजित किया गया था। इस लेखक द्वारा लगातार आयोजित भव्य धार्मिक अनुष्ठानों की कड़ी में ही उक्त धार्मिक अनुष्ठान भी शामिल है। अशोक कुमार दूबे ने जप पुस्तिकाओ में बाबा बासुकीनाथ शब्द का प्रयोग इसलिये किया, क्योंकि सर्वत्र इसी नाम से जाना जाता है दुमका जिला का यह शिवलिंग। एक शिलालेख में वासुकीनाथ, तो दूसरे में बासुकिनाथ शब्द अंकित है। इस प्रकार तीनों में से कहें जो भी नाम, भारत के अलावा विदेशों के भी भक्तों की आस्था जुड़ी हुई है इस स्थल से। (साभार : झारखंड की उपराजधानी दुमका से प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक ‘बासुकि मेल’ से।
(लेखक संताल परगना के जाने-माने पुरातत्वविद् है।)
