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बोल बम यात्रा : तप, त्याग और त्राण संगम के साथ भक्ति का एक सामूहिक उत्सव 

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  • डॉ.धनंजय कुमार मिश्र

बाबा श्री बैद्यनाथ के द्वार तक पहुँचती श्रद्धा की वह अग्नि-रेखा है, जिसे न पथ की कठिनाई रोक पाती है,न शरीर की थकान। झारखंड राज्य के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम न केवल भारतवर्ष का एक प्रमुख ज्योतिर्लिंग है, बल्कि श्रावण मास में आयोजित “बोल बम यात्रा” के कारण यह स्थल एक भक्ति-भाव का अद्भुत केंद्र बन जाता है। लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष सुल्तानगंज से गंगा जल लेकर, लगभग 105 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करते हुए, “बोल बम! हर-हर महादेव!” की जयध्वनि के साथ देवघर पहुँचते हैं। यह यात्रा महज एक शरीरिक परिश्रम नहीं, बल्कि एक आत्मिक अनुशासन, दिव्य तपस्या और सामूहिक चेतना की महागाथा है।

पौराणिक संदर्भ : देवघर स्थित महादेव वैद्यनाथ हैं। बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ी कथा त्रेता युग की है। जब रावण, भगवान शिव को लंका में स्थापित करना चाहता था, तो उसने कठोर तप से प्रसन्न कर शिवलिंग प्राप्त किया। शर्त यह थी कि वह इसे मार्ग में कहीं न रखे। देवताओं ने उसे रोकने हेतु छल से शिवलिंग रखवा दिया। रावण ने बहुत प्रयास किया, परन्तु शिवलिंग वहीं स्थिर हो गया। क्रोधित रावण ने अपने अंगों को काट-काटकर शिव को अर्पित किया। जब उसने अपना सिर भी अर्पित करने की चेष्टा की, तो भगवान शिव प्रकट हुए और वैद्य की भाँति उसके अंगों को जोड़ा। तभी से शिव इस धाम में “बैद्यनाथ”, अर्थात वैद्य रूप में पूजे जाते हैं।
इतिहास और परंपरा का संगम
इतिहास में यह तीर्थ बौद्ध और जैन अनुयायियों का भी केंद्र रहा है। बंगाल, बिहार, झारखंड और उड़ीसा से लेकर नेपाल तक के श्रद्धालु यहाँ आते हैं। गुप्तकाल, पाल वंश और राजवंशों के अभिलेखों में देवघर का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस जैसे संतों ने भी यहाँ दर्शन किए थे।
बोल बम यात्रा : तप, त्याग और त्राण का संगम

श्रावण मास में गंगा से जल उठाकर श्रद्धालु “कांवड़” में उसे रखते हैं और नंगे पाँव, निराहार (या सात्विक आहार) चलकर देवघर पहुँचते हैं। यह कोई एक दिन की बात नहीं। पूरे महीने भर में सप्ताहों तक यह यात्रा चलती है। रात्रि हो या दिन, वर्षा हो या धूप—हर कांवड़िया केवल एक ही मंत्र जपता है”बोल बम!”। यह नारा न केवल गूंज है, बल्कि शिव को पुकारने का लोकगीत है। इसमें आर्तनाद भी है, आनंद भी, आराधना भी और आत्मबल भी। बोल बम महज शब्द नहीं, यह श्रद्धा का स्वर है, जो शिव के अभिषेक जल के साथ बहता है।
भक्ति का सामूहिक उत्सव

देवघर की यह यात्रा धार्मिक से अधिक सामाजिक-आध्यात्मिक आयोजन बन गई है। गाँव-गाँव से टोली बनाकर युवा, वृद्ध, महिलाएँ, बच्चे इस यात्रा में सम्मिलित होते हैं। मार्ग में सेवा शिविर लगते हैं, जहाँ जलपान, औषधि, आराम और आराधना सब उपलब्ध होती है। यह भारत की उस सामूहिक भक्ति-संस्कृति का उदाहरण है, जिसमें भेदभाव मिट जाते हैं, और केवल एक ही पहचान शेष रहती है -बम— अर्थात् “कांवड़िया”।

साहित्य और संस्कृति में बोल बम

भारतीय लोककाव्य, गीत, भजन और नाटक में बोल बम यात्रा का उल्लेख मिलता है। भोजपुरी, मैथिली, बंगला और अंगिका भाषाओं में इसके वर्णन मिलते हैं, भक्ति भावना के गीत हैं। लोकगीतों में यह यात्रा शिव से संवाद का माध्यम है। महिलाएँ सावन में शिव महिमा गाकर भी यात्रा की सफलता की कामना करती हैं।

कहा जा सकता है कि बोल बम एक यात्रा नहीं, एक साधना है, जिसमें व्यक्ति अपने अहंकार को, आलस्य को, मोह को और ममता को जल में डुबाकर शिव को अर्पित करता है। कांवर की डंडी केवल गंगाजल का भार नहीं, आत्मबल का वह स्तंभ है जो जीवन की कठिनाइयों को सहते हुए भी “जय शिव!” का उद्घोष करता है।

आज के इस यांत्रिक, आत्मकेंद्रित युग में बोल थबम यात्रा यह सिखाती है कि सामूहिक साधना से ही हम शिवत्व प्राप्त कर सकते हैं। अपने भीतर के रावण को शांत कर शिव को जागृत कर सकते हैं।
बोल बम! हर-हर बम! गंगाजल से भिगा हर कण, शिवमय हो उठे!
देवघर की पथरीली ज़मीन पर, जब प्रेम के चरण पड़ते हैं, तो स्वयं कैलास झुक आता है!

(लेखक सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं।)

डॉ.धनंजय कुमार मिश्र
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