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बोलबम : सोमवार को भगवान शिव की उपासना व पूजा का हैं विशेष महत्व

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  • डॉ.धनंजय कुमार मिश्र

सावन का महीना भारतीय सनातन परम्परा में शिवभक्ति का परम उत्सव है। यह केवल ऋतुओं का संधिकाल नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का आध्यात्मिक अवसर है। समस्त सृष्टि जब हरियाली से हर्षित होती है, तब भक्तजन शिवोपासना में लीन हो जाते हैं। विशेष रूप से सोमवार के दिन भगवान शिव की उपासना को अति फलदायक माना गया है।

 शिव आदिदेव हैं , अनादि और अनन्त हैं।

भगवान शिव सृष्टि के आरम्भ से पूर्व भी थे और प्रलय के पश्चात् भी विद्यमान रहेंगे। वे ‘स्वयंभू’, अर्थात् स्वयंसिद्ध सत्ता हैं, जिन्हें किसी ने उत्पन्न नहीं किया। पुराणों में वे आदिदेव माने गए हैं त्रिदेवों में ‘महादेव’ की उपाधि से विभूषित। उनके अंग-अंग में तत्त्वज्ञान समाहित है। कंठ में कालकूट विष, मस्तक पर चन्द्रमा, जटाओं में गंगा और नेत्रों में ब्रह्माण्ड की अग्नि।

मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय निकले विष को जब देवता, दानव और मनुष्य कोई भी स्वीकार न कर सके, तब भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की। इस तेजोमय बलिदान के प्रतीकस्वरूप भक्तजन सावन के माह में विशेष रूप से शिवलिंग पर जल, दूध, बिल्वपत्र आदि अर्पित करते हैं। इससे शिव प्रसन्न होते हैं।

सोमवार को शिव की पूजा विशेष इसलिए कही गई है, क्योंकि ‘सोम’ स्वयं चन्द्रमा का नाम है, जिसे शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया हैं। यह दिन मन की शुद्धि और व्रत के माध्यम से आत्म-नियंत्रण का प्रतीक बन गया है।

भारतीय संस्कृति में अध्यात्म की दृष्टि से शिव ब्रह्म स्वरूप हैं।

शिव केवल एक देवता नहीं, वे एक तत्त्व हैं — निर्गुण-निर्विकल्प ब्रह्म का सगुण स्वरूप। वे योगियों के आराध्य, ताण्डव के नर्तक और ध्यान में लीन महासाधक हैं। उनकी मुद्रा ‘अभय’ है जो ‘अभयदान’ के परमदाता हैं । उनके नाम से ही भय दूर होता है — शं करोति इति शंकर:।

मान्यता है कि शिवपूजन से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। शिव की आराधना से व्रती को समस्त सांसारिक बन्धनों से मुक्ति मिलती है। रोग-शोक, भय और दु:ख मिटते हैं। विशेषकर कुंवारी कन्याएँ ‘सोमवारी व्रत’ रखकर उत्तम वर की प्राप्ति का संकल्प करती हैं। गृहस्थजन शिव की कृपा से अपने पारिवारिक जीवन को सौहार्दपूर्ण बनाते हैं।

शिवलिंग कोई मात्र पिण्ड नहीं, वह सगुण ब्रह्म का प्रतीक है, जिसमें सृष्टि, स्थिति और संहार तीनों तत्त्व एक साथ समाहित हैं। यजुर्वेद कहता है:

“नमः शिवाय च शिवतराय च” — शिव को और शिव से भी अधिक कल्याणकारी शिव को नमस्कार है।

सावन शिवभक्ति का मास है — जल अर्पण कर मन की चंचलता को स्थिर करने का प्रयास है। शिव की आराधना केवल पूजा नहीं, आत्म-शोधन का मार्ग है।

डॉ.धनंजय कुमार मिश्र

(विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका)

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