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बोलबम : द्वादश ज्योतिर्लिंग के नाम का केवल ध्यान करने मात्र से हो जाता है भक्तों का कल्याण

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डॉ.धनंजय कुमार मिश्र

“न भूतो न भविष्यति” यह वाक्य शिवतत्त्व की उस व्यापकता का परिचायक है, जो संपूर्ण सृष्टि के मूल में अंतर्निहित है। त्रिलोक के अधिपति, कालों के नियंता और पंचमहाभूतों के एकमात्र नियामक भगवान शिव अपने बारह दिव्य ज्योतिर्लिंग रूपों में आज भी उसी भव्यता से पूजित हैं, जैसे आदिकाल में थे। श्रद्धा और भक्ति का केन्द्र ये द्वादश ज्योतिर्लिंग, न केवल तीर्थ रूप में बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा के स्तम्भ हैं। इनका स्मरण मात्र प्राणियों के भीतर सुप्त ब्रह्मचेतना को जाग्रत करता है। जीवन की व्याधियों, तापों और विकारों से त्रस्त मनुष्य जब शिव के इन दिव्य रूपों का नामोच्चार करता है, तब वह लौकिकता से पार उतरकर आत्मिक शांति का अनुभव करता है। पुराणों, विशेषतः शिवपुराण और स्कन्दपुराण में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की महिमा का विशद उल्लेख मिलता है। शिव का प्रत्येक रूप चाहे वह सोमनाथ हो, महाकाल हो या विश्वनाथ किसी न किसी गूढ़ तत्त्व का प्रतीक है। ये लिंग केवल पाषाण नहीं, अपितु चेतना के स्तम्भ हैं। इनके प्रति श्रद्धा, आस्था और समर्पण मनुष्य को दान, तप, योग और भक्ति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। भारतीय समाज में शिव का स्थान केवल एक पूज्य देवता तक सीमित नहीं है। वे लोक के भी हैं और परलोक के भी। शिवरात्रि पर जागरण, श्रावण में अभिषेक और द्वादश लिंगों की यात्रा यह सब हमारे समाज को एकता, सेवा और समर्पण की भावना से जोड़ता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों का स्मरण, दरअसल समाज में संतुलन, सदाचार और सहिष्णुता की भावनाओं को पुष्ट करता है। प्रत्येक ज्योतिर्लिंग का एक विशेष अध्यात्म-केन्द्र हैं।

1. सोमनाथ (गुजरात) — काल की अवज्ञा करने वाला अनादि रूप। 2. मल्लिकार्जुन (आंध्र) — पिता-पुत्र स्नेह का प्रतीक। 3. महाकाल (उज्जैन) — मृत्यु के भय का नाशक। 4. ओंकारेश्वर (मध्यप्रदेश) — प्रणवस्वरूप का द्योतक। 5. केदारनाथ (उत्तराखंड) — तप और त्याग का आलंबन। 6. भीमशंकर (महाराष्ट्र) — राक्षसी प्रवृत्तियों पर विजय। 7. काशी विश्वनाथ। (वाराणसी) — मोक्षदायिनी चेतना। 8. त्र्यंबकेश्वर (नासिक) — त्रिगुणातीत स्वरूप। 9. वैद्यनाथ (देवघर) — रोग और दुःख निवारक। 10. नागेश्वर (द्वारका) — संकटमोचन। 11. रामेश्वर (रामनाथपुरम्) — मर्यादा का प्रतीक। 12. घृष्णेश्वर (औरंगाबाद) — श्रद्धा की परिणति।

आज जब भौतिकता की अंधी दौड़ में मानव अपने अस्तित्व को खोता जा रहा है, तब शिव के ये ज्योतिर्लिंग मानो चेतावनी दे रहा हैं — “रुको! भीतर की ओर देखो।”

श्रावण मास में होनेवाला शिवाभिषेक और द्वादश लिंगों के स्मरण की परंपरा, न केवल धार्मिक, बल्कि एक व्यापक दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपरा को पुष्ट करता है। यह परंपरा हमें अहंकार से रहित, करुणा से युक्त और प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाती है।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों की महिमा को शब्दों में समेटना कठिन है, किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि इनका स्मरण मात्र भी कल्याणकारी है। जैसे सूर्य के उदय से अंधकार मिट जाता है, वैसे ही शिव के नाम-जप से पाप, भय और विकारों का अंत होता है। आइए, इस शिव-स्मृति को केवल एक अनुष्ठान न मानकर जीवन का पथदर्शक बनाएं — क्योंकि “शिवं शान्तं अद्वैतं” ही अंतिम सत्य है।

(लेखक सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं।)

 

 

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