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बाबा बासुकिनाथ के नाम एक मां की चिट्ठी

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✍️विश्वजीत राहा
(स्वतंत्र टिप्पणीकार)              braha.dmk01@gmail.com

मैक्सिकन लेखक जीएल फुएंतेय की कहानी ए लेटर टू गाॅड में फसल के नष्ट होने पर कहानी के नायक लेन्चो भगवान को पत्र लिखता है। उसके लिए भगवान कोई अमूर्त सत्ता नहीं, बल्कि विश्वास की वह शक्ति हैं, जिसके सामने वह अपनी परेशानी रख सकता है। वह पत्र वास्तव में कागज पर लिखे शब्दों से अधिक उसकी उम्मीद का दस्तावेज है।
श्रावणी मेले में बाबा बासुकिनाथ मंदिर परिसर में दण्डाधिकारी के रूप में ड्यूटी करते हुए मुझे एक ऐसा ही पत्र मिला। फर्क सिर्फ इतना था कि यह साहित्य की कहानी नहीं, वास्तविक जीवन की घटना थी। पत्र किसी आर्थिक मदद की मांग नहीं कर रहा था। उसमें एक माँ अपने बच्चों के भविष्य के लिए भगवान से आशीर्वाद मांग रही थी।
मंदिर परिसर में ड्यूटी के दौरान मिला वह हस्तलिखित पत्र देखने में सामान्य था। ऊपर लिखा था ‘जय बाबा बासुकिनाथ’ और भगवान भोलेनाथ को संबोधित करते हुए उसमें परिवार की प्रार्थना दर्ज थी। पत्र लिखनेवाली जो शायद सिंगल मदर है दीप्ति मिश्रा जो बच्चों के स्कूल की व्यस्तता के कारण स्वयं मंदिर नहीं आ सकी थी। इसलिए उसने अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर बाबा के दरबार में भेज दिया था। यही इस पत्र की सबसे मार्मिक बात थी कि व्यक्ति मंदिर तक नहीं पहुंच सका, लेकिन उसकी प्रार्थना पहुंच गई। अंग्रेजी में लिखे इस पत्र में बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, एकाग्रता और सफलता के साथ-साथ बच्चे के दयालु, मेहनती और संस्कारी बनने का आशीर्वाद मांगा गया था।
इन कुछ पंक्तियों में एक परिवार की पूरी दुनिया दिखाई देती है। बच्चों का भविष्य माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता और सबसे बड़ा सपना होता है। अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार और सफलता की इच्छा किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि समाज के हर परिवार की साझा आकांक्षा है। इस पत्र में भी वही चिंता थी, लेकिन उसके साथ निराशा नहीं थी। एक माँ ने अपनी चिंता को प्रार्थना में बदल दिया था। उन्होंने अपने बच्चों के भविष्य को बाबा बासुकिनाथ के भरोसे सौंप दिया था। यही आस्था की ताकत है। प्रार्थना परिस्थितियों को बदलती तो नहीं, लेकिन वह मनुष्य को परिस्थितियों का सामना करने का साहस और उम्मीद जरूर देती है।
ए लेटर टू गाॅड में लेन्चो संकट की घड़ी में भगवान को पत्र लिखता है, क्योंकि उसे भरोसा है कि भगवान उसकी बात सुनेंगे। बाबा बासुकिनाथ मंदिर में मिला पत्र भी उसी विश्वास का आधुनिक और वास्तविक रूप था। दोनों पत्रों की परिस्थितियां अलग थीं। एक किसान अपनी फसल के लिए सहायता मांग रहा था, जबकि यहां एक माँ अपने बच्चों के भविष्य के लिए आशीर्वाद मांग रही थी। लेकिन दोनों के केंद्र में एक ही भावना थी ईश्वर पर विश्वास। शायद यही कारण है कि जी एल फुएंतेस की वह कहानी अचानक वास्तविक जीवन में मेरे सामने जीवंत हो उठी।
श्रावणी मेला जैसे विशाल धार्मिक आयोजन में दण्डाधिकारी की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं रहती। लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच सुरक्षा, सुविधा, अनुशासन और सुचारु व्यवस्था सुनिश्चित करना प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी है। लेकिन इस पत्र ने प्रशासनिक भूमिका का एक दूसरा पक्ष सामने रखा संवेदना। मंदिर परिसर में दिखाई देने वाली भीड़ वास्तव में असंख्य व्यक्तिगत कहानियों से बनी होती है। बाहर से एक भीड़ दिखाई देती है, लेकिन भीतर से प्रत्येक व्यक्ति अपनी अलग कहानी लेकर आया होता है। इसलिए किसी बड़े धार्मिक आयोजन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि भीड़ कितनी व्यवस्थित रही।
इस पत्र की एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंता थी। इसका अर्थ है कि आस्था के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई थी। एक माँ भगवान से बच्चों के लिए आशीर्वाद मांग रही है, लेकिन बच्चों को पढ़ाने और उनके भविष्य को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट रही है। यही स्वस्थ आस्था है प्रार्थना के साथ प्रयास। ईश्वर से सफलता की कामना करना और उस सफलता के लिए स्वयं मेहनत करना दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
बाबा बासुकिनाथ का श्रावणी मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि भारतीय समाज की विविधता और भावनात्मक एकता का जीवंत दृश्य है। दूर-दूर से आए लोग एक ही विश्वास के साथ बाबा के दरबार में पहुंचते हैं। किसी के पास बड़ी मनोकामना है, किसी के पास छोटी। कोई शब्दों में कहता है, कोई मौन में। कोई जल चढ़ाता है, कोई माथा टेकता है और कोई पत्र लिखकर अपने मन की बात भगवान को सौंप देता है। मुझे मिला यह पत्र इसी विशाल आस्था-संसार की एक छोटी-सी लेकिन गहरी कहानी है। यह पत्र मेरे लिए इसलिए विशेष बन गया क्योंकि वह किसी सरकारी आवेदन या शिकायत का दस्तावेज नहीं था। यह एक अनजान माँ के विश्वास की अभिव्यक्ति थी। उसने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि मंदिर में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल दर्शनार्थी नहीं होता। वह अपने साथ अपने परिवार की उम्मीदें, अपने जीवन की चिंताएं और अपने भविष्य के सपने भी लेकर आता है। एक साधारण कागज पर लिखे कुछ शब्दों में एक परिवार का प्रेम, बच्चों के भविष्य की चिंता और भगवान के प्रति समर्पण समाया हुआ था।
ए लेटर टू गाॅड के लेन्चो के पत्र की तरह ही बाबा बासुकिनाथ के दरबार में मिला यह पत्र भी उसी मानवीय विश्वास की अभिव्यक्ति थी। एक व्यक्ति स्वयं मंदिर में उपस्थित नहीं हो सका, लेकिन उसने अपनी प्रार्थना वहां पहुंचा दी। इस घटना ने एक सरल लेकिन गहरी बात समझाई। भगवान को लिखी गई चिट्ठी का महत्व इस बात में नहीं कि वह डाक की तरह भगवान तक पहुंचती है या नहीं। उसका महत्व इस बात में है कि उसे लिखते समय मनुष्य के भीतर कितना विश्वास था।प्रार्थना कभी शब्दों में होती है, कभी मौन में, कभी आंसुओं में और कभी एक छोटे-से कागज पर लिखे कुछ वाक्यों में। लेकिन उसका मूल भाव एक ही है उम्मीद। शायद ए लेटर टू गाॅड और इस वास्तविक पत्र का सबसे सुंदर साझा संदेश यही है कि जब मन में विश्वास हो, तो दूरी भगवान और भक्त के बीच दीवार नहीं बनती। #####

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