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स्मृति शेष : आज की राजनीति में विरले ही देखने व सुनने को मिलते है गुरूजी समान राजनेता

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– रवि कांत सुमन

तिथि 02 फरवरी 2015, अवसर झारखंड मुक्ति मोर्चा का 23वां झारखंड दिवस। स्थान, दुमका का गांधी मैदान। रात के करीब ढाई बजते होंगे। गुरूजी यानि पार्टी सुप्रीमो शिबू सोरेन के अध्यक्षीय भाषण की बारी। गुरूजी के मंच पर खड़ा होते ही पूरा गांधी मैदान ‘वीर शिबू सोरेन जिन्दाबाद’ के नारे से गूंज उठा। उनसे पहले के वक्ताओं ने अपने भाषण में मुख्य रूप से तत्कालीन झारखंड की रघुवर सरकार को जमकर कोसा था। सभी के भाषण में आंदोलन की गंध थी। मैदान में हजारों की तादात में हर उम्र के लोग कनकनाती ठंड में बैठे थे। इंतजार था केवल गुरूजी को सुनने का। इसका पता तब लगा था जब गुरूजी के भाषण के बाद लोग चलते बने। पूर्व के वक्ताओं को सुनने के बाद खासकर पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं व समर्थकों को लगा होगा गुरूजी का भाषण भी उन्हें आंदोलन को प्रेरित करेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। गुरूजी आखिर गुरूजी निकले। करीब 10 मिनट के भाषण में उन्होंने दूर-दराज से आये लोगों को जो सीख दी थी, आज के दिनों में शायद ही किसी राजनीतिक दल के सभाओं में यह सीख मिलती हो। गुरूजी ने अपने भाषण में यहां के लोगों को बताया था कि उन्नति का मार्ग शिक्षा है। इसलिए अपने बच्चों को निश्चित रूप से पढ़ाओं। उन्होंने कहा था-कृषि हमारा आधार है, इसे मत भूलो। खेती-बाड़ी व पशुपालन पर विशेष ध्यान दो। तत्कालीन सरकार पर निशाना साधे बिना उन्होंने बड़े ही सरल ढंग से कहा था कि अलग राज्य हमें मिल गया है, पर जो उन्नति होनी चाहिए थी वह नहीं हो सकी है। आलम यह है कि राज्य के गरीब और गरीब हो गये और अमीर और अधिक अमीर हो गये। यहां कल-कारखाने तो है, पर स्थानीय लोगों को इसका फायदा नहीं होता, जिस पर विचार करने की जरूरत है। बस इतना ही, कहकर गुरूजी मंच पर बैठ गये थे। गुरूजी के इस छोटे भाषण ने उस समय झारखंड के 14 साल के इतिहास को सामने रख दिया था। उन्होंने अपने भाषण में लोगों को विकास के लिए शिक्षा और तत्कालीन सरकार को राज्य की उन्नति के लिए विचार करने की सलाह दी थी। गुरूजी का भाषण समारोह में उमड़ने वाली लोगों की भीड़ का राज और गुरूजी की अहमियत बता गया था। झामुमो के इस झारखंड दिवस पर पार्टी की ओर से गुरूजी की अमृतवाणी से संबंधित एक कैलेंडर भी प्रकाशित किया गया था। इस कैलेंडर में गुरूजी को युग पुरूष दिशोम गुरू बताया गया था। कैलेंडर गुरूजी के भाषण को सुनने से पहले देखने को मिला था, लेकिन भाषण सुनने के बाद लोगों को गुरूजी का संदेश सच में अमृत समान लग रहा था, जो आज की राजनीति में विरले की देखने को मिलता है।

(लेखक वेबअखबार डाॅट काॅम के संपादक हैं।)

 

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