दुमका। बुधवार को दुमका कोर्ट परिसर में महान साहित्यकार, कवि एवं खोरठा भाषा के प्रख्यात हस्ताक्षर स्मृति शेष सुकुमार जी (सुरेश कुमार विश्वकर्मा) की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। साहित्य परिवार दुमका, संस्कार भारती दुमका इकाई एवं खोरठा भाषा उत्थान संघर्ष समिति, दुमका के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में शहर के वरिष्ठ साहित्यकारों, साहित्यप्रेमियों, अधिवक्ताओं एवं गणमान्य नागरिकों ने उनकी तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धासुमन अर्पित किए। सभा में वक्ताओं ने बताया कि बोकारो जिले के नवाडीह प्रखंड अंतर्गत भेंडरा गांव निवासी खोरठा साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार एवं कवि सुकुमार जी का 29 मई को निधन हो गया। उनके निधन को खोरठा भाषा और साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति बताया गया। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.अमरेंद्र सुमन ने शब्दांजलि अर्पित करते हुए कहा कि सुकुमार जी का जीवन सादगी, संघर्ष और उच्च विचारों की मिसाल था। झारखंड राज्य लोकभाषा खोरठा रत्न
से सम्मानित इस साहित्यकार का असमय निधन साहित्य समाज को गहरे आघात पहुंचाने वाला है। उन्होंने कहा कि आर्थिक अभाव और समुचित इलाज नहीं मिल पाने के कारण उन्हें अस्पताल से वापस घर लौटना पड़ा और यात्रा के दौरान ही उन्होंने अंतिम सांस ली। वरिष्ठ साहित्यकार एवं अधिवक्ता विद्यापति झा ने कहा कि सुकुमार जी केवल कवि और साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक जन आंदोलनकारी भी थे। खोरठा भाषा के प्रचार-प्रसार तथा उसे व्यापक पहचान दिलाने में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। उन्होंने खोरठा साहित्य को गांव-जंगल की सीमाओं से निकालकर विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार एवं गीतकार कमलाकांत प्रसाद सिन्हा ने की, जबकि संयोजन डॉ.अमरेंद्र सुमन ने किया। इस अवसर पर संस्कार भारती दुमका इकाई के अध्यक्ष एवं खोरठा भाषा उन्नयन संघर्ष समिति के संस्थापक बिष्णु देव महतो ‘अलबेला’ ने सुकुमार जी के जीवन और साहित्यिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सुकुमार जी का संपूर्ण जीवन माय, माटी, मानुष और मातृभाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए समर्पित रहा। वे लोकप्रिय नाटककार, गीतकार, कवि तथा सुकंठ गायक थे। उनकी रचनाओं में झारखंड की माटी की महक और लोकजीवन की संवेदनाएं सहज रूप से झलकती हैं। अपने मधुर गायन के कारण उन्हें खोरठा साहित्य जगत में “खोरठा कोकिल” की उपाधि से सम्मानित किया गया था। अलबेला ने कहा कि इलाज के अभाव में ऐसी महान विभूति का निधन होना अत्यंत दु:खद है और यह स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। श्रद्धांजलि स्वरूप उन्होंने सुकुमार जी की कालजयी रचना “मांदर बाजे बाँसी बाजे रे” प्रस्तुत कर उन्हें नमन किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार एवं अधिवक्ता डॉ.अमरेंद्र सुमन, विद्यापति झा, अशोक सिंह, डॉ.मधुर मोहन सिंह, एहतेशाम अहमद, नीलकंठ झा, वरिष्ठ पत्रकार मनोज केसरी, ऋतुराज सहित साहित्य, कला, संस्कृति एवं सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे।
