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सूचना आयुक्त चयन पर सवाल : क्या यह पद अब राजनीतिक चेहरों तक ही सीमित?

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✍️ डॉ.सिकन्दर कुमार,अधिवक्ता, दुमका

झारखंड में सूचना आयुक्त जैसे संवैधानिक महत्व के पद पर चल रही चयन प्रक्रिया अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। जिस उम्मीद और विश्वास के साथ आम नागरिकों ने इस पद के लिए आवेदन किया था, वह अब टूटता नजर आ रहा है। आरोप यह है कि यह पूरी प्रक्रिया कहीं न कहीं पहले से तय राजनीतिक चेहरों को पद पर बैठाने की औपचारिकता बनकर रह गई है।

सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यही है— क्या अब इस पद के लिए योग्यता, अनुभव और ईमानदारी नहीं, बल्कि राजनीतिक जुड़ाव ही असली “क्वालिफिकेशन” बन गया है?

सूत्रों के अनुसार जिन नामों की चर्चा है, वे अधिकांशतः ऐसे व्यक्तियों के हैं जिनका सीधा संबंध किसी न किसी राजनीतिक दल या सत्ता के करीबियों से रहा है। यदि यह सही है, तो फिर लाखों आम नागरिकों से आवेदन मंगवाने का क्या औचित्य था? क्या यह पूरी प्रक्रिया केवल दिखावे के लिए थी?

सूचना का अधिकार कानून आम जनता को सशक्त बनाने के उद्देश्य से बनाया गया था—ताकि सरकार और प्रशासन जवाबदेह बने। लेकिन यदि उसी कानून की निगरानी करने वाले पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया ही पारदर्शी न हो, तो आम आदमी न्याय और निष्पक्षता की उम्मीद आखिर किससे करे?

अब आवेदन करने वाले उम्मीदवार भी खुलकर सवाल उठा रहे हैं—

चयन के मापदंड क्या हैं?

शॉर्टलिस्टिंग किस आधार पर की जा रही है?

क्या बिना राजनीतिक पहचान के किसी योग्य उम्मीदवार के लिए कोई वास्तविक अवसर बचा है?

यह आरोप भी सामने आ रहा है कि पूरी चयन प्रक्रिया पहले से तय नामों को वैधता देने का माध्यम बन चुकी है। यदि ऐसा है, तो यह केवल एक नियुक्ति का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सीधा आघात है।

सरकार के लिए अब यह आवश्यक हो गया है कि वह स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से जवाब दे—

क्या यह चयन प्रक्रिया वास्तव में निष्पक्ष है, या फिर “अपने लोगों” को पद पर बैठाने की एक सोची-समझी कवायद?

जब आम जनता को ही इस प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाएगा, तो “सूचना का अधिकार” केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाएगा। ऐसे में जरूरी है कि चयन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाया जाए। वरना जनता का भरोसा टूटना तय है।

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