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सम्पूर्ण सृष्टि के नियंता : नटराज शिव

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  • डॉ.धनंजय कुमार मिश्र •
शिवं शान्तं शिवं शाश्वतम्” — यह उद्घोष केवल वैदिक भाव नहीं, भारतीय संस्कृति का अनन्त संगीत है।
वह शिव ही हैं, जो नटराज स्वरूप में सम्पूर्ण सृष्टि के नर्तक हैं। उनका एक-एक अंग, एक-एक मुद्रा और डमरु की हर ध्वनि कला, ज्ञान और चेतना का प्रतीक है। वह केवल देव नहीं, नृत्य, तत्त्व, व्याकरण, ब्रह्माण्ड और शून्य के एकमेव अधिष्ठाता हैं।
नटराज — जहां धर्म, शास्त्र और कला का संगम होता है
“नटराज” — अर्थात् नर्तक राजाधिराज, ऐसा कोई अन्य उदाहरण विश्व की किसी भी सभ्यता में नहीं मिलता जहाँ सृजन और संहार की क्रिया को नर्तन द्वारा दर्शाया गया हो।
उनकी मूर्ति में जो अग्नि है, वह अज्ञान का दहन है। जो डमरु है, वह ध्वनि का बीज है। उनका अभय हस्त संरक्षण का प्रतीक है, और उठाया गया चरण — मोक्ष की ओर आरोहण का संकेत।
शिव के डमरु से निकली हमारी भाषा
भारतीय ध्वनि-विज्ञान में एक विशिष्ट स्थान है माहेश्वर सूत्रों का, जो शिव के डमरु से उद्भूत माने जाते हैं। यह विश्वास केवल आस्था नहीं, संस्कृत व्याकरण के प्राचीनतम स्तंभ पाणिनि की अष्टाध्यायी का मूल है।
उदाहरणतः
> नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्।।
यह चौदह माहेश्वर सूत्र —
अ इ उण्। ऋ लृक्। ए ओङ्। ऐ औच्। ह य व रट्। लण्।…
आज भी भारत की भाषाओं की ध्वनियों का आधार हैं।
रचना और प्रलय का गूढ़ दर्शन
नटराज शिव के दो प्रमुख तांडव स्वरूप हैं —
1. रौद्र तांडव — जिसमें सृष्टि का संहार होता है।
2. आनन्द तांडव — जिसमें जीवन का सृजन और विस्तार होता है।
प्राचीन भारतीय चिंतन मानता है कि शिव के तांडव से ही समय गतिशील होता है।
यह तांडव मात्र नृत्य नहीं, वरन् वह “पञ्चकृत्य” का जीवंत अभिनय है — सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव (माया), और अनुग्रह (मोक्ष)।कला और चेतना के शाश्वत प्रेरणा स्रोत
नटराज केवल अध्यात्म का नहीं, कला का भी आधार हैं।
भरतनाट्यम्, ओडिसी, कथक जैसे शास्त्रीय नृत्यों के आदिगुरु वही माने जाते हैं। भारतीय नाट्यशास्त्र के अनुसार शिव का नृत्य ही संगीत और नाट्य की प्रेरणा है।
उनका स्वरूप सूचित करता है — “जहाँ गति है, वहाँ शिव हैं। जहाँ जड़ता है, वहाँ शिव की प्रतीक्षा है।”
नटराज : विज्ञान और दर्शन के संगम
भारत के प्राचीन ऋषि जानते थे कि सृष्टि की मूल भाषा ‘ध्वनि’ है — जिसे आज विज्ञान में ‘vibration’ कहा जाता है।
नटराज की मूर्ति को जब CERN (यूरोपियन परमाणु अनुसंधान केंद्र) जैसे वैज्ञानिक संस्थान के सामने स्थापित किया जाता है, तो यह प्रमाण है कि भारतीय प्रतीक केवल धार्मिक नहीं, कॉस्मिक विज्ञान के गूढ़ प्रतीक हैं।
निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि शिव में गति है, शिव में मौन है। शिव के नटराज रूप में जीवन की प्रारम्भिक स्पंदन से लेकर परम मौन तक की सम्पूर्ण यात्रा समाहित है। उनका एक-एक अंग, एक-एक संकेत हमें यह सिखाता है कि आत्मा का नर्तन ही सृष्टि है — और शिव उसी नर्तन के नियंता हैं। वे न केवल पूजनीय हैं, अपितु चिन्तनीय भी हैं।
आज जब मानवता नित्य नूतन संकटों से जूझ रही है, तब शिव का नटराज रूप एक संदेश देता है — “रचनात्मक गति में ही समाधान है।”

— 🔱 नटराजाय नमः! शिवम् अस्तु सर्वजनानाम्।।

डॉ.धनंजय कुमार मिश्र

(लेखक सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका, झारखंड में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं। )

 

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