•डॉ.कृपा शंकर अवस्थी•
पिछले लगभग तीन महीने से राज्यभर के सभी अंगीभूत महाविद्यालयों के करीब एक हजार अशैक्षणिक इंटरकर्मी लगातार राजभवन रांची के समक्ष धरना देने को विवश हैं। उनके प्रति सहानुभूति किसी माननीय ने नहीं दिखाई,उल्टे माननीय राज्यपाल महोदय ने विगत मार्च में उनकी वर्षों की सेवा को एकाएक नई शिक्षा नीति लागू करने के बहाने समाप्त कर दिया हैं। नई शिक्षा नीति लागू करने में ये सारे अनुबंध अशैक्षणिक इंटरकर्मी किस रूप में बाधक हो सकते थे, यह आज तक़ नहीं बताया गया। शायद माननीय को सहयोग और सलाह देने वाले नौकरशाहों ने यह शिक्षा दी हो, तभी इतने सख्त आदेश आए हैं कि अंगीभूत कॉलेजों में इंटर की पढ़ाई, दाखिले बंद कर दिए गए। अब इंटर की पढ़ाई को उत्सुक लगभग सवा चार लाख छात्र छात्राएं जो इस वर्ष उत्तीर्ण हुए हैं,उन्हें अब प्लस टू या उत्कर्मित इंटर कॉलेजों में दाखिला लेना होगा। ऐसे कॉलेजों की कुल संख्या महज ग्यारह सौ के आसपास हैं। अर्थात प्रति ऐसे शिक्षण संस्थानों में अनुमातः चार सौ विद्यार्थी पढ़ाई करेंगे। इन संस्थानों में शायद ही इतनी व्यवस्था हो कि सभी छात्र/छात्राएं एक साथ पढ़ाई कर सके। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक लगभग आठ हजार ऐसे विद्यालय हैं जिसमें विषयवार शिक्षक नियुक्त नहीँ हैं। कहीं कोटे के शिक्षक नहीं मिल रहे, तो कहीं नियुक्ति मानक घटा दिए जाने पर भी उनके पद खाली रह जा रहे हैं। कोटे के चक्कर में कैसे कैसे शिक्षक नियुक्त की, उसकी चर्चा ही न कि जाए तो बेहतर है। अंग्रेजी के शिक्षक सही सही क्रम से विषय के छब्बीस अल्फाबेट न लिख सकें। रसायन विज्ञान के शिक्षक हाइड्रो क्लोरिक एसिड का सांकेतिक नाम न बता पाएं, तो हम कितनी उम्दा शिक्षा नई शिक्षा नीति के तहत दे पाएंगे। वस्तुतः नई शिक्षा नीति पर यदि ज्यादा जोर दिया गया तो पूरे प्रदेश में हिंसा संभाली नहीं जा सकेगी। माननीय न्यायालयों में याचिकाओं की बाढ़ आ जाएगी। यदि सबकुछ जान समझ नई नीति लाई जा रही हो तो कहना ही पड़ेगा मौजूदा राज्य सरकार को संकट में डालने का षड्यंत्र चल रहा है। ऐसे में प्राइवेट स्कूल जो गिनती भर ही हैं, उन्हें छोड़ दें, तो उक्त सरकारी संस्थानों में न इतने बड़े बड़े कमरे होंगे न इतने टेबल/बेंच कि सारे बच्चे बैठकर शिक्षा ग्रहण कर सकें। जिन विद्यालयों में शिक्षकों का घोर आभाव,सभी विषयों के जानकार शिक्षक तक़ बहाल नहीं किये जा सके,वहां बच्चों को कितनी उत्तम शिक्षा मुहैय्या कराई जा सकती हैं। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता हैं। कॉमन विषय हिंदी, अंग्रेजी में एक साथ बैठने से लेकर प्रयोगशालाओं की नियमानुकूल व्यवस्था भी चिंताजनक है। कम्प्यूटर क्लास होते ही नहीं। हो भी तो कैसे, बिजली व्यवस्था दुरुस्त नहीं, पर्याप्त संख्या में चालू कम्प्यूटर और विशेषज्ञ शिक्षकों की बहाली ही नहीं की गई हैं। संगीत की कक्षाओं के लिए काम चलाऊ वाद्ययंत्र या शिक्षक भी नदारत, बस परिणाम अव्वल दिखाना अनिवार्य हैं, वर्ना वेतन कटौती,बस्थानांतरण। मूल्यांकन केंद्रों पर यही गुहार,यही समन्वय साझा तालमेल या कहें घालमेल से उत्तम परिणाम बना लिए जाते हैं। सरकारें अपनी पीठ इस अनुपातिक सफलता पर खुद थपथपाती दिखाई देती हैं। तीन से पांच हजार रुपए मासिक मानदेय पर ये अनुबंध इंटरकर्मी तब बहाल किये गए थे जब सन पैंसठ में बहाल लगभग सभी स्थाई अशैक्षणिक कर्मचारी या तो अवकाश ग्रहण कर चुके थे या कुछ दिवंगत हो चुके थे। राज्य सरकारें सस्ते श्रम के लोभ में इन कर्मियों की बहाली नहीं कर रही थी। सरकारों को घंटी आधारित शिक्षक बहाल करने की लत लगी हुई है। छात्रों के दाखिले से लेकर निबंधन के साथ आठवीं से लेकर प्लस टू और फिर विश्वविद्यालय की डिग्री स्तर की सभी परीक्षाओं का सारा दायित्व इन इंटरकर्मियों पर था। यहां तक कि राज्य सरकार द्वारा संचालित सभी प्रतियोगिता परीक्षाओं का सफल संचालन तक ये कर्मी संभालते रहे थे। इतना ही नहीं कॉलेजों के इंटर फण्ड में जो लाखों रुपए की जमा राशि हैं या थी,वह इनकी ईमानदारी और कर्मठता का बयान करती हैं। भले उस फण्ड का मनमाना दुरूपयोग विवि और कॉलेजों के माननीय करने से कभी नहीं चुके। कॉलेजों के इंटर फण्ड की नियमित ऑडिट वर्षों से कौंसिल भुलाए बैठा हैं। इंटर फंड से आउट सोर्सिंग से बहाल कर्मियों के मानदेय भुगतान किये जाते रहे। विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह से लेकर कॉलेजों के विकास कार्य तक इंटर फण्ड से ही किये जाते रहे हैं। सरकारें बताए ये कर्मी कब वेतन बढ़ोत्तरी, छुट्टियों और सुविधाओं के लिए हड़ताल करते देखे गए। समय पर कॉलेज आना, कभी देर तक ड्यूटी करना छोड़ इन्होने क्या कभी कॉलेजों में तालाबंदी, कलमबंद कार्य बहिष्कार भी किया हैं, या ये कर्मी काला बिल्ला लगा विरोध प्रदर्शन भी करते दिखे कभी। इतने अनुशासित कर्मी का फिर क़्या दोष था, जिस कारण इन्हें सीधे एक फरमान से वर्षो की सेवा के बावजूद भी हटा दिया गया। अंगीभूत कॉलेजों में इंटर की पढ़ाई क्यों बंद कर दी गई, इस प्रश्न का उत्तर कोई जाँच एजेंसी भी कभी बता नहीं पाएगी। दरअसल माननीयों में आउट सोर्सिंग से अनुभवहीन कर्मचारियों की नियुक्ति का लोभ घर कर गया हैं। इतने स्वच्छ भ्रष्टाचार को पकड़ पाना आसान नहीं हैं। सैकड़ों सुरक्षा गार्ड की बहाली का आलम हम सभी देख चुके हैं। आठ हजार प्रतिमाह के एवज में उन्हें मात्र तीन हजार बमुश्किल दिए जाते थे। छुट्टियों में उसमें भी सीधी कटौती हो जाती थी यह भी गौर करने और अफ़सोस जनक पहलू है कि सत्ता पक्ष से लेकर विपक्षी नेतागण भी इन बदकिस्मत कर्मियों की सुध लेने इतने दिनों तक नहीं आए। यहाँ तक कि विगत तीन महीने से इंटरकर्मियों के धरने को पब्लिक डोमेन में लाने का दायित्व संभालने वाले प्रजातंत्र के चौथे प्रहरी, स्थापित पत्रकार, बड़े मीडिया घराने और यहाँ तक कि टीवी चैनल वाले भी कभी इनकी स्तिथि बताते नहीं देखें-सुने गए। जबकि सत्ता की मलाई उड़ाने का कोई अवसर वे छोड़ते नहीं। हाँ इतना जरुर तय हैं, कभी माननीय न्यायविद महोदय ने स्वयं संज्ञान लिया, जैसा कई मामलों में उनका निर्णय भी आ चुका हैं, तो राज्य के माननीय माने जाने वाले सारे महानुभावों की किरकिरी होनी तय हैं। इन कर्मठ, ईमानदार अंगीभूत इंटरकरियों को नैसर्गिक न्याय से कोई वंचित नहीं कर सकता। यदि राज्य के माननीयों ने अपने फैसलों पर पुनर्विचार नहीं किया,अमानवीयता जारी रखी,न्यायलय के निर्णयों का अनादर करना बंदन नहीं किया। उनके समायोजन की मांग को सत्तामद में दबाकर अनसुना किया तो राज्य में संभावित विद्रोह को वे संभाल नहीं पाएंगे।
(लेखक सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका के सेवानिवृत उपाचार्य हैं।)
