रंग लाया समाजसेवी सच्चिदानंद का प्रयास : आस्था के साथ शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहा आदिवासी समाज

दुमका। आदिवासी समाज की आत्मा में बसने वाला पारंपरिक पूजा स्थल मंझी थान आज फिर से नई ऊर्जा और श्रद्धा के साथ जीवंत हो उठा है। इस आध्यात्मिक पहल को जन-जन तक पहुंचाने में दुमका के समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण बनकर उभरी है, जो पिछले कई वर्षों से गांव-गांव जाकर लोगों को अपनी परंपराओं से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। सच्चिदानंद ने बताया कि वे इस अभियान को पिछले 4-5 वर्षों से निरंतर चला रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य
आदिवासी समाज को अध्यात्म से जोड़कर नशा से दूर करना और समाज में शिक्षा का प्रसार करना है, ताकि समाज का समुचित और अपेक्षित विकास हो सके। इसके साथ ही वे समाज में फैली कुरीतियों, तर्कहीन परंपराओं और अंधविश्वास को दूर करने का भी सतत प्रयास कर रहे हैं। उनके सतत प्रयासों का ही परिणाम है कि अब दुमका जिले के दर्जनों गांवों में हर रविवार मंझी थान पर साप्ताहिक पूजा-अर्चना शुरू हो चुकी है। यह क्रम लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे गांव-गांव में आस्था के साथ सामाजिक जागरूकता की नई चेतना भी फैल रही है। इसी क्रम में इस रविवार दुमका प्रखंड के माचखिचा गांव में भी साप्ताहिक मांझी थान पूजा की शुरुआत की गई। गांव के लेखा होड़ (संताल परंपरा के संचालक) के नेतृत्व में ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से मंझी थान में एकत्र होकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार धूप, अगरबत्ती, जल, लड्डू, गुड़, चूड़ा आदि अर्पित कर विधिवत पूजा-अर्चना की। यह पूजा संताल समाज के आराध्य देव
मरांग बुरु के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम है। इसका उद्देश्य न केवल धार्मिक आस्था को सशक्त करना है, बल्कि सामुदायिक एकता, आध्यात्मिक शांति और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखना भी है। लेखा होड़ ने बताया कि इस पहल के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी परंपरा, संस्कृति और जीवन मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि वे अपने रीति-रिवाजों को समझें और उन पर गर्व करें। पूजा के दौरान बच्चों और युवाओं को नशा से दूर रहने, नियमित विद्यालय जाने और माता-पिता व बुजुर्गों का सम्मान करने का संदेश दिया गया। ग्रामीणों ने यह भी निर्णय लिया कि पूजा में प्राप्त दान राशि का उपयोग केवल मांझी थान के संरक्षण, मरम्मत और सामाजिक-धार्मिक कार्यों में किया जाएगा तथा इसे किसी भी प्रकार के नशे में खर्च नहीं किया जाएगा।
ग्रामीणों का मानना है कि इस साप्ताहिक मांझी थान बोंगा बुरु (पूजा) से गांवों में सुख-शांति, समृद्धि और भाईचारा बढ़ेगा और समाज धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से और अधिक सशक्त बनेगा। इस अवसर पर राजा मरांडी, पलटन हेम्ब्रम, बुधन हांसदा, सुशील मरांडी, मुन्नू मुर्मू, जीवन टुडु, जय मुर्मू, रायसन मरांडी, परमेश्वर हांसदा, बाबुसोल हांसदा, सुरदेश मरांडी, एलिजाबेद मरांडी, सुकुरमुनि टुडु, चुड़की मुर्मू, हीरामुनि टुडु, मलोती मरांडी, मीरु मुर्मू, सोनोति सोरेन सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे। गौरतलब है कि समाजसेवी सच्चिदानंद सोरेन की यह पहल आज गांव-गांव में फैलती हुई एक सकारात्मक बदलाव का संकेत दे रही है, जहां आस्था के साथ शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक सुधार की दिशा में आदिवासी समाज मजबूती से आगे बढ़ रहा है। (webakhbar.com)
