- डाॅ.धनंजय कुमार मिश्र
सावन मास आते ही सम्पूर्ण प्रकृति शिवमय हो जाती है। हर घट, हर शिखर, हर जलधारा, हर वायु-लहरी शिव की उपस्थिति का आभास कराती है। हमारे शिव — शंकर — महादेव केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, अपितु समन्वय, पर्यावरण-संतुलन और प्राकृतिक जीवनशैली के आदि प्रतीक हैं। हमारे सर्वस्व भोलेनाथ, महामृत्युंजय, पर्यावरणीय संकटों के बीच आशा की वह शाश्वत ज्योति हैं, जो विषपान कर अमृतमय संतुलन की स्थापना करते हैं।
*शिव का समन्वयी चमत्कार : कालिदास की दृष्टि*
संस्कृत के महाकवि कालिदास अपने समस्त काव्यग्रन्थों के मंगलाचरण में शिव को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। उनके लिए शिव केवल देवता नहीं, बल्कि प्रकृति के समस्त तत्वों के समन्वय का पर्यावरणीय दिव्य प्रतीक हैं। अभिज्ञानशाकुन्तलम् के नान्दीपाठ में कालिदास ने शिव को वनस्पति, वन्य जीवों और जलवायु से घिरे व्यापक परिवेश में आराध्य रूप में प्रस्तुत किया है।
*विरोधों में समरसता का चमत्कार — शिव का पर्यावरणीय रूप*
शिव का स्वरूप ही पर्यावरणीय समरसता की पाठशाला है। उनके मस्तक पर गंगा का जल, नेत्र में अग्नि, ललाट पर चन्द्रमा का अमृत, और कण्ठ में हलाहल विष — यह समस्त विरोधी तत्वों का एक साथ धारण शिव जैसे समन्वयी महापुरुष ही कर सकते हैं। यह केवल प्रतीक नहीं, बल्कि यह हमें सिखाता है कि विष और अमृत, अग्नि और जल, संकट और समाधान — सबका संतुलन ही जीवन का आधार है।
*शिव का पर्यावरणीय परिवार : एक जीवंत सहअस्तित्व का प्रतीक*
शिव परिवार स्वयं में जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन का आदर्श नमूना है। शिव का वाहन वृषभ (बैल), पार्वती का वाहन सिंह, गणेश का मूषक और कार्तिकेय का मयूर — ये सब परस्पर स्वाभाविक शत्रु होते हुए भी एक ही छाया में, एक ही छन्द में जीते हैं। शिव के गले में सर्प है, और पार्श्व में नंदी — ये विरोध नहीं, समन्वय की सजीव मूर्ति हैं। यह सन्देश देता है कि परस्पर भिन्नता के बावजूद सह-अस्तित्व सम्भव है।
*शिव और प्रकृति : अध्यात्म एवं विज्ञान का संगम*
प्राचीन भारतीय चिन्तन में अष्टमूर्ति शिव — आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य और आत्मा — इन आठ तत्वों के अधिष्ठाता माने जाते हैं। यह प्रकृति के समस्त तत्वों के प्रति सम्मान और संतुलन का बोध कराता है। कालिदास ने शिव को भूतनाथ, पशुपति, वैद्यनाथ, विश्वनाथ जैसे अनेक नामों से पुकारा है जो उनके व्यापक पर्यावरणीय, सामाजिक और मानवीय स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।
*शिव-तत्व का सार : सन्तुलन ही शिव है*
आज जब मानव द्वारा निर्मित असंतुलन ने जलवायु परिवर्तन, जैवविविधता क्षरण और प्रदूषण जैसे संकट खड़े किए हैं, तब शिव के जीवन से प्रेरणा लेकर हमें भी ‘विषपान’ करने की – अर्थात् कष्ट उठाकर सन्तुलन की पुनर्स्थापना की आवश्यकता है। यही शिवतत्त्व की आत्मा है — संहार में भी सृजन, विष में भी कल्याण, भिन्नताओं में भी समन्वय।
अंततः, सावन शिव का ही नहीं, समन्वय का भी माह है। शिव की आराधना तभी सार्थक होगी जब हम प्रकृति के समस्त अंगों से समरसता रखें — जल, वायु, वनस्पति, पशु-पक्षी और समस्त जीवों से प्रेम करें। शिव स्वयं कल्याण हैं, और कल्याण का मार्ग समन्वय से ही निकलता है।
(लेखक सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं।)
